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Thursday, 27 April 2017

Amulya Khabar

Motivational Story in Hindi...मजबूत इरादे...






Motivational Story in Hindi...मजबूत इरादे...

Posted on 28.04.2017 By: Deep Singh Yadav

परेशानियाँ हमारे जीवन की एक सच्चाई है। कुछ लोग इस बात को समझ लेते हैं लेकिन कुछ लोग पूरे
जीवन भर इसका रोना रोते रहते हैं। ज़िंदगी के हर मोड़ पर हमारा सामना परेशानियों से होता है, इसके बिना ज़िंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती।


अक्सर हमारे सामने मुसीबते आती है तो तो हम उनके सामने हताश, निराश हो जाते है। उस समय हमें कुछ समझ नहीं आता की क्या सही है और क्या गलत , क्या करें ,क्या न करें। हर व्यक्ति का परिस्थितियों को देखने का नज़रिया अलग अलग होता है। कई बार हमारी ज़िंदगी मे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। उस कठिन समय मे कुछ लोग टूट कर बिखर जाते है, तो कुछ संभल जाते है।
मनोविज्ञान के अनुसार इंसान किसी भी  समस्या को दो तरीको से देखता है...

1 समस्या पर focus करके...
2 समाधान पर focus करके...


समस्या पर focus करके अक्सर मुसीबतों मे ढेर हो जाते है। इस तरह के लोग किसी भी परेशानी में उसका समाधान ढ़ूँढ़नें की बजाय उस परेशानी के बारे मे ज्यादा सोचते है। वही दूसरी ओर समाधान पर focus करके परेशानियों मे उसके समाधान के बारे मे ज्यादा सोचते है। इस तरह के लोग परेशानियों  का मुकाबला मजबूती के साथ करते है।

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मित्रो,  आज मैं आपके साथ एक महान solution focus व्यकि्त की कहानी बताने  जा रहा हूँ जो आपको किसी भी परेशानी से लड़ने के लिए प्रोत्साहित  करेगी। मित्रो, आपने नेपोलियन बोनापार्ट (napoleon Bonaparte) का नाम तो सुना ही होगा। जी हाँ वही नापोलियन बोनापार्ट जो फ़्रांस के एक महान निडर और साहसी शासक थे। जिनके जीवन मे असंभव नाम का कोई शब्द नहीं था। इतिहास में नेपोलियन को विश्व के सबसे महान और अजय सेनापतियों में से एक गिना जाता है। वह इतिहास के सबसे महान विजेताओं में से माने जाते थे । उसके सामने कोई टिक नहीं पाता था।

नेपोलियन के मजबूत इरादों की कहानी...  Motivational story...
नेपोलियन अक्सर जोखिम  भरे काम किया करते थे। एक बार उन्होने आलपास पर्वत को पार करने का ऐलान किया और अपनी सेना के साथ चल पड़े। सामने एक विशाल और गगनचुम्बी पहाड़ खड़ा था जिसपर चढ़ाई करना संभव नहीं था। उसकी सेना में अचानक हलचल की स्थिति पैदा हो गई। फिर भी उसने अपनी सेना को चढ़ाई का आदेश दिया। पास मे ही एक बुजुर्ग औरत खड़ी थी। उसने जैसे ही यह सुना वो उसके पास आकर बोली कि क्यों मरना चाहते हो। यहाँ जो भी आया है है वो मुँह की खाकर यही रह गया। अगर अपनी ज़िंदगी से प्यार है तो वापस चले जाओ। उस औरत की यह बात सुनकर नेपोलियन नाराज़ होने की बजाये प्रेरित हुआ और उसने झट हीरो का हार उतारकर उस बुजुर्ग महिला को पहना दिया और फिर बोला, "आपने मेरा उत्साह दोगुना कर दिया और मुझे प्रेरित किया है।  अगर मै जिंदा बचा तो आप मेरी जय-जयकार करना।" उस औरत ने नेपोलियन की बात सुनकर कहा- तुम पहले व्यकि्त हो जो मेरी बात सुनकर हताश और निराश नहीं हुए।  "जो करने या मरने" और मुसीबतों का सामना करने का इरादा रखते है, वह लोग कभी नही हारते।

आज सचिन तेंदुलकर को इसलिए क्रिकेट का भगवान कहा जाता है क्योंकि उन्होंने जरूरत के समय ही अपना शानदार खेल दिखाया और भारतीय टीम को  परेशानियों से उभारा। ऐसा नहीं है कि ये परेशानियँ हम जैसे लोगों के सामने ही आती है, भगवान राम के सामने भी मुसीबते आयी थी। विवाह के बाद वनवास हो गया। चौदह वर्षों की परेशानियाँ एक साथ मिलि। उन्होंने सभी परेशानियों का सामना आदर्श तरीके से किया। इसीलिये उन्हें मर्यादा पुरुसोत्तम कहा जाता है। परेशानियाँ  ही हमें आदर्श बनाती है।
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एक बात हमेशा याद रखिये...
जिंदगी में मुसीबते चाय के कप में जमी हुई मलाई की तरह है।
कामयाब वो लोग हैं जिन्हें फूँक मार कर मलाई को एक तरफ करके  चाय पीना आता है।


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Sunday, 4 December 2016

Amulya Khabar

Motivational / Success Story in Hindi >> उपमा विर्दी "चाय वाली"



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Motivational / Success Story in Hindi... उपमा विर्दी "चाय वाली"
Posted On 04.12.2016 By: Deep Singh Yadav 


चाय नेशनल ड्रिंक आफ इण्डिया यह कहना शायद गलत नहीं होगा। सुबह उठते ही गर्मा गर्म एक कप चाय मिल जाये तो फिर क्या कहने। चाय दुःख ओर सुख दोंनो में हमारा साथ देती है। अधिकांशतः मेहमान का स्वागत चाय से ही किया जाता है़। कुछ दिनों पहले पाकिस्तान का चाय वाला फेमस हो गया था। इतना फेमस हुआ कि आज वो एक माडल बन चुका है। लेकिन अब एक भारत की चाय वाली फेमस हो चुकी है। इस लड़की की उम्र 26 साल है, और यह एक वकील (लायर ) है। इसके चाय बनाने की कला ने ही इसे फेमस बना दिया है। अब आपको बताते हैं इण्डिया की इस चाय वाली के बारे में...




एक वकील से चाय वाली बनने तक का सफर....



भारत में सभी के दिन की शुरुआत एक कप चाय से होती है। जिनको घर पर चाय नहीं मिलती है वो घर से बाहर होटल या चाय की दुकानों पर चाय पीने जाते हैं। लेकिन चाय का व्यापार इतना बड़ा विजनैस मेन बना देगा यह किसी ने सोचा भी नहीं था। भारत की रहने वाली उपमा विर्दी ने चाय का विजनेस करके अपनी पहचान देश और दुनिया में चाय वाली के तौर बना ली।



उपमा विर्दी का जन्म चण्डीगड़ मे हुआ था और उपमा की उम्र है लगभग 26 वर्ष। अपनी शुरुआती पढ़ाई करने के बाद वो आस्ट्रेलिया ला की पढ़ाई करने चली गई और मेलबर्न मे रहने लगी। कुछ समय बाद उन्हें ये लगा कि आस्ट्रेलिया में अच्छी चाय बहुत मुश्किल से मिल पाती है़। उपमा ने अच्छी चाय देने की ठान की। उपमा ने अपने घर वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर चाय का विजनेस शुरु किया जो कि कुछ समय बाद चल निकला।



उपमा को चाय बेचने का आइडिया अपने दादा जी से मिला। उनके दादा जी चण्डीगढ़ में आयुर्वेदिक दवायें बेचते थे। दादा जी ने ही बताया था कि चाय में कौन कौन से मसाले कितनी मात्रा में डालने चाहिए। चाय के विजनेस की वजह से उपमा ने अपना नाम आस्ट्रेलिया की" बिजनेसवुमन आफ द ईयर"  के रुप में दर्ज करवा किया।
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आस्ट्रेलिया में एक टी फेस्टीवल हुआ जिसमें उपमा ने कहा था कि भारतीय चाय का स्वाद दुनियाँ के अन्य देशों से बिल्कुल अलग है, क्योंकि भारत के लोग चाय को स्वादिष्ट बनाने के लिए उसमे अदरक, लौंग, इलाइची, जड़ी बूटियों का प्रयोग करते हैं।



शुरुआत में उपमा के माता पिता इस बिजनेस के खिलाफ थे। उपमा के माता पिता ने उपमा से कहा कि तुमने कानून की पढ़ाई की है और बिजनेस करोगी चाय का़। लेकिन उपमा ने माता पिता को समझाया और चाय का बिजनेस शुरु किया। उपमा ने चाय को एक बिजनस के रुप में अपना कर अपनी एक अलग पहचान बनाई। उपमा ने यह साबित कर दिया कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है।



चाय के बिजनेस की वजह से ही उपमा को इण्डिन आस्ट्रेलियन बिजनेस एण्ड कम्युनिटि ने "बिजनेस वुमन आफ द ईयर" 2016 का आवार्ड दिया है। उपमा के हाथों की बनी चाय आस्ट्रेलिया में बहुत पसंद की जा रही है। लोग उपमा से चाय बनाने का तरीका भी सीख रहे हैं। उपमा अलग अलग शहरों में जाकर चाय बनाने की कला के बारे में क्लास लेतीं हैं। 
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Wednesday, 23 November 2016

Amulya Khabar

Motivational/Success Story in Hindi >> के एम मेमन मैपिल्लई

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 Motivational/Success Story in Hindi... के एम मेमन मैपिल्लई
Posted On 23.11.2016 By: Deep Singh Yadav
 हौसला हो तो इंसान कोई भी मुकाम हासिल कर सकता है। कुछ ऐसा ही एमआरएफ टायर कंपनी के मालिक एम मेमन मैपिल्लई ने कर दिखाया। एक समय था  जब मेमन गुब्बारे बेचने थे, लेकिन अपनी  मेहनत और लगन के दम पर एमआरएफ जैसी कंपनी बना कर खड़ी कर दी। वर्तमान समय में एमआरएफ टायर की मार्केट कैप 22 हजार करोड़ की हो चुकी है।

एमआरएफ टायर यानी मद्रास रबर फैक्ट्री आज टायर इंडस्ट्री में बड़ा नाम है, लेकिन एक समय था जब इस कंपनी को शुरू करने वाले शख्स के एम मेमन मैपिल्लई ने सड़कों पर गुब्बारे बेचे थे। मेमन आजादी से पहले केरल की सड़कों पर पैदल घूमकर एक बैग में गुब्बारे रखकर बेचा करते थे। मेमन के पिता ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया  और जेल भी गए थे। मेमन के पिता जब जेल में थे तो वह गुब्बारे बेचकर परिवार का भरण पोषण करते थे औऱ साथ में पढ़ाई भी।

मेमन ने ग्रेजुएशन भी टायर मैन्युफैक्चरिंग से ही किया था और फिर करीब 6 साल तक गुब्बारे का कारोबार करने के बाद 1946 में ट्रीड रबर बनाना शुरू कर दिया। 24 साल की उम्र में ही मेमन ने बिजनेस शुरू कर दिया था। शुरुआत में एक छोटे से कमरे में बैलून और बच्चों के खिलौने बनाने वाले मेमन अब रबर और टायर के बिजनेस में आ गए थे।

मेमन ने 1960 में प्राइवेट लिमिडेट कंपनी बनाई। उनको रबर और टायरों के बारे अच्छी जानकारी थी। प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाने के बाद मेमन ने टायर बनाने के लिए अमेरिका की मैंसफील्ड टायर एंड रबर कंपनी के साथ टाईअप किया। 1967 में एफआरएफ अमेरिका को एक्सपोर्ट करने वाली पहली कंपनी बन गई, तो वहीं 1973 में कंपनी ने देश में पहली बार नायलान टायर लॉन्च किया। साल 1979 तक कंपनी का नाम विदेश में फैल चुका था, लेकिन इसी साल अमेरिकी कंपनी मैंसफील्ड ने एफआरएफ से अपनी हिस्सेदारी खत्म कर ली। इसके बाद कंपनी का नाम एमआरएफ लिमिटेड हो गया। इसके बाद मेमन ने छोटी-बड़ी कई कंपनियों के साथ टाईअप कर कंपनी को एक नए मुकाम पर पहुंचाया। साल 2003 में 80 साल की उम्र में मेमन का निधन हो गया। लेकिन मेमन तब तक कंपनी को टायर के फील्ड में नंबर वन बना दिया।

मेमन के निधन के बाद इनके बेटों ने बिजनेस की कमान संभाली , कंपनी लगातार ग्रोथ करती रही। यह मेमन की मेहनत और उनके बेटों की काबिलियत ही है कि आज एमआरएफ 22 हजार करोड़ की कंपनी बन चुकी है। इसके एक शेयर की 52 हजार रुपए है, जो कि भारत में सबसे ज्यादा है।












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Wednesday, 2 November 2016

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Motivational Story in Hindi >>> अचूक औषधि प्रेम की


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Motivational Story in Hindi... अचूक औषधि प्रेम की..
Posted On 03.11.2016 By: Deep Singh Yadav 

एक बार ईसा मसीह किसी गाँव में पहुँचे। वहां किसी दुराचारी व्यक्ति ने शिष्यों सहित उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया। ईसा मसीह ने  उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। गांव के सभी लोग दुराचारी व्यक्ति से घृणा करते थे और उससे दूर रहने में ही ठीक समझते थे। सब लोग आश्चर्यचकित थे कि ईसा मसीह ने उस व्यक्ति के घर भोजन करना  स्वीकार कैसे कर लिया? एक बूढ़े व्यक्ति ने तो गांव वालों को सलाह दे डाली कि सब ईसा मसीह के पास चलें और उनसे अपने मन की बात साफ-साफ कह दें।

सबको उस बुजुर्ग की सलाह पसंद आई और वे एक साथ ईसा मसीह से मिलने चल दिए। गांव  वाले जब उनके पास पहुँचे तो वे भोजन के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे। बुजुर्ग की बात उन्होंने ध्यान से सुनी और फिर मुस्कराकर पूछा-'बाबा, आप मुझे एक बात बताएं। चिकित्सक स्वस्थ मनुष्य के घर पर जाता है या किसी रोगी के। बुजुर्ग ने कहा रोगी के
मैं भी चिकित्सक बनकर एक रोगी के घर जा रहा हूँ। उसे घृणा का विष नहीं, प्रेम की अचूक औषधि चाहिए।

बुरे व्यक्ति को अच्छा बनाना है तो उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। उसके संपर्क में आओ, तभी वह आपका सम्मान करेगा। उसके अंदर जो दुर्गुण मौजूद हैं, उनसे हमें अवश्य बचना चाहिए, किंतु उससे घृणा करके उसका हृदय कभी नहीं बदला जा सकता। हमें पापी से नहीं पाप से घृणा करनी चाहिए। उसे पाप से मुक्त करने की चेष्टा करनी चाहिए। संसार में कोई भी व्यक्ति निर्विकार नहीं है। एक दूसरे पर दोषारोपण करने से जीवन, समाज और संसार की गति अवरुद्ध हो जाएगी। इसलिए तिरस्कृत व बहिष्कृत करने की बजाय किसी को अपनत्व से समझाना व सुधारना ही ठीक है।' यह सुनते ही गांव वाले उन्हें नमन कर सिर झुकाए चुपचाप वापस चले गए।

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Monday, 31 October 2016

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Motivational / Success Story Of Patricia Narayan in Hindi >>> Love Marriage ने बर्बाद की जिंदगी, फिर लगाया ठेला, पहली कमाई 50 पैसे अब Daily कमाती हैं 2 लाख रु०.

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विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अवार्ड प्राप्त करती पेट्रीसिया नारायण।
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 Motivational / Success Story Of  Patricia Narayan in Hindi ... 

Love Marriage ने बर्बाद की जिंदगी, फिर लगाया

ठेला, पहली कमाई 50 पैसे अब Daily कमाती हैं 2 लाख रु०...

Posted On 01.11.2016 By: Deep Singh Yadav

 चेन्नई की पेट्रीसिया नारायण पर यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है किसंघर्ष करने वालों की कभी हार नहीं होती है। जो अपने जीवन में संघर्षों से मुंह नहीं मोड़ते, उन्हीं पर किस्मत मेहरबान होती है। इस कहावत को सच किया है चेन्नई की पेट्रीसिया नारायण ने। कभी मरीना बीच पर कॉफी और कटलेट बेचने वाली पेट्रीसिया नारायण ने 50 पैसे कमाकर अपनी कमाई को दो लाख तक पहुंचाया। इस चुनौतीपूर्ण सफर को पेट्रीसिया ने किस तरह से आसान बनाया, वो आज लोगों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। 

पेट्रीसिया नारायण का जन्म ईसाई परिवार में हुआ था। अपने परिवार के खिलाफ जाकर पेट्रीसिया ने एक ब्राह्मण लड़के से लव मैरिज की। शादी के बाद उसके पति ने न सिर्फ नौकरी छोड़ दी, बल्कि शराब और ड्रग्स के नशे में पूरी तरह डूब गया। पेट्रीसिया अपने पति के तमाम अत्याचारों को सहती रही और उसने दो बच्चों को जन्म दिया। जब पति का अत्याचार हद से ज्यादा बढ़ गया तो उसने अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपने पति से अलग होना ही ठीक समझा।

 पति से अलग होकर पेट्रीसिया ने अपने बच्चों का पेट भरने के लिए अपने कुकिंग के हुनर को अपना हथियार बनाया। उन्होंने एक ठेला लगाकर मरीना बीच पर कॉफी और कटलेट बेचने का काम शुरु किया। लेकिन पहले दिन उनके ठेले से सिर्फ एक कॉफी बिकी जिससे  50 पैसे मिले। हालांकि इस बात से पेट्रीसिया काफी निराश हुईं, लेकिन उनकी मां ने हौसला बढ़ाते हुए और ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे पेट्रीसिया की कड़ी मेहनत रंग दिखाने लगी और 1982 से 2003 के बीच पेट्रीसिया की दिन की कमाई 50 पैसे से बढकर 25000 रूपए रोज हो गई।

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 पेट्रीसिया किसी व्यवसायी परिवार से संबंध नहीं रखती थी। उसने तो शादी के बाद घर बसाने का सोचा था, लेकिन उसकी शादी ने उसका पूरा का पूरा जीवन बदल दिया। अपने दुखों को हथियार बनाकर पेट्रीसिया ने मरीना बीच के पास स्लम क्लियरेंस बोर्ड और नेशनल मैनेजमेंट ट्रेनिंग स्कूल में कैंटीन लगाई। इस कैंटीन के जरिए अब पेट्रीसिया की कमाई बढ़कर एक लाख रुपए प्रति हफ्ते तक पहुंच गई। पेट्रीसिया कहती है कि इसके बाद मेरी जीवन शैली भी बदल गई। एक साइकिल रिक्शा में सफर शुरू करके मैं ऑटो रिक्शा पर आई और अब मेरे पास अपनी कार है।
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जब पेट्रीसिया नारायण का बिजनेस चल निकला तब उसने साल 2003 में अपनी बेटी की शादी कर दी और बेटा प्रवीण मर्चेंट नेवी में नौकरी कर रहा था। बेटी की शादी के बाद पेट्रीसिया अपना पहला रेस्टोरेंट शुरु करने वाली थीं कि एक कार एक्सीडेंट में उनकी बेटी और दामाद की मौत हो गई। इस दुर्घटना ने उन्हें तोड़ दिया और वो अपने वेंचर्स से दूर होने लगीं। इस हादसे के बाद पेट्रीसिया के बेटे प्रवीण कुमार ने जिम्मेदारी संभाली और अपनी बहन की याद में 'संदीपा' नाम से पहले रेस्टोरेंट की शुरूआत की।
 दो कर्मचारियों से शुरूआत करनेवाली पेट्रीसिया नारायण के पास आज 200 कर्मचारी हैं और उनकी खुद की रेस्टॉरेंट चेन है। संदीपा रेस्टोरेंट के चेन्नई में आज करीब 14 आउटलेट्स चल रहे हैं। जिससे आज पेट्रीसिया नारायण की रोज की कमाई दो लाख रुपए तक पहुंच गई है।

 यह तो पेट्रीसिया नारायण की मेहनत और लगन का ही नतीजा था कि उन्हें साल 2010 में 'फिक्की एंटरप्रॉन्यॉर ऑफ द ईयर' का खिताब भी मिल चुका है। कई लोग ऐसे हैं, जो कुछ पाने के लिए सपने तो देखते हैं, लेकिन संघर्षों से घबराकर हार मान लेतें है। ऐसे ही लोगों के लिए पेट्रीसिया नारायण एक प्रेरणा स्रोत हैं, जिन्होंने ये साबित किया है कि अगर आप निरंतर संघर्ष करते हैं तो एक न एक दिन किस्मत भी आपके आगे झुकने के लिए मजबूर हो जाती है।


 

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Tuesday, 25 October 2016

Amulya Khabar

Motivational Story in Hindi >>>प्रेत का डर >>>Hindi Motivational Stories

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Motivational Story in Hindi... प्रेत का डर..  
Hindi Motivational Stories... 

Posted On 25.10.2016 By : Deep Singh Yadav

 कुमराली गांव में जय सिंह नाम के एक जमींदार रहते थे, जिनके पांच बेटे और एक बेटी थी। इकलौती बेटी होने के कारण उसे सबसे ज़्यादा दुलार भी मिला। जमींदार की बेटी ज्योति, अपने पिता के इस दुलार की वज़ह से हठी और गुस्सैल स्वभाव की हो गई। इसके अलावा वो आलसी भी थी। एक दिन जमींदार की पत्नी ने उससे कहा, ‘बेटी तो पराया धन होती है, तुम इसे इतना सिर न चढ़ाओ। विवाह के बाद कैसे निभाएगी?’ ‘मैं इसके ससुराल दास-दासियां भिजवा दूंगा।’ जमींदार ने कहा। कुमराली के पास एक गांव में एक गरीब किसान रहता था। उसके बेटे का नाम था वीरभान। वीरभान के जन्म के समय ही उसकी माता की मृत्यु हो गई थी। वीरभान को किसान ने ही पाल-पोस कर बड़ा किया था। महामारी में किसान का बैल मर गया। दूसरा बैल खरीदने के लिए उसे जय सिंह से पैसे उधार लेने पड़े। वर्षा न होने से फसल भी न हुई। लगातार ब्याज से किसान का ऋणभार बढ़ता रहा। पिता-पुत्र इसी चिन्ता में डूबे रहते। समय के साथ जमींदार की बेटी ज्योति भी बड़ी हो गई। जमींदार को उसके विवाह की चिन्ता हुई। ज्योति से विवाह करने के लिए कोई भी युवक तैयार नहीं हो रहा था। तभी जमींदार को वीरभान का ख्याल आया। वीरभान सुन्दर होने के साथ बुद्धिमान भी है। इसके अलावा किसान उनका कर्जदार भी है, सो इस रिश्ते के लिए वो मना भी नहीं करेगा। धन के प्रभाव से ज्योति को खुश भी रखेगा, यही सोच कर जमींदार ने किसान के यहां विवाह प्रस्ताव भेजा। न चाहते हुए भी वीरभान को यह शादी करनी पड़ी। ससुराल में भी ज्योति का व्यवहार नहीं बदला। पति के साथ ससुर को भी फटकार देती थी। किसान जमींदार के भय की वज़ह से कुछ न बोलता था। वीरभान गंभीर और स्वाभिमानी युवक था। कुछ दिन तक तो वो चुपचाप अपने पिता का ये अपमान देखता रहा, क्योंकि वो ज्योति की शिकायत करता भी तो किससे? एक दिन वीरभान ने अपने पिता के कान में कुछ कहा। पुत्र की बात सुन पिता ने भी स्वीकृति में गरदन हिला दी। अगले दिन वीरभान ने चुपके से सभी दास-दासियों को जमींदार के घर वापस भेज दिया। उसने कहा, ‘अपने घर की जिम्मेदारी स्वयं निभानी चाहिए।’ ज्योति जब सोकर उठी तो उसे बहुत  जोर से भूख लगी। वीरभान ने कहा, ‘खाना बना लो।’ ज्योति रुआंसी होकर कहने लगी,‘इस कड़ाके की ठंड में मुझसे खाना नहीं बनेगा।’ ‘कोई बात नहीं, खाना मैं बना लूंगा। बस रसोई में तुम मेरी थोड़ी मदद कर देना।’ वीरभान बोला। अब वीरभान की बात मानने के अलावा ज्योति के पास कोई चारा नहीं था। दोनों ने मिलकर खाना बनाया। वीरभान खाने के बाद बोला, ‘मैं खेत पर जा रहा हूं काम करने, तुम घर में चौकस रहना।’ ‘चौकस क्यों?’ ज्योति ने पूछा। वीरभान ने बताया, ‘दिन मे प्रेत यहां से गुÊारते हैं और जो भी उनकी तरफ देखता है, वो उसे नोंच डालते हैं।’ ज्योति डर गई। ‘नहीं, नहीं! तब तो मैं यहां नहीं रहूंगी।’ एकाएक उसके मुंह से निकला। वीरभान ने पूछा, ‘तो तुम मेरे साथ खेत चलोगी?’ ज्योति बोली,‘मैं इस ठंड में बाहर नहीं जा सकती। एक बात बताओ ये प्रेत तुम्हारे सामने क्यों नहीं आते?’ वीरभान ने कहा,‘मेरे सामने भी आते हैं। पर जो उनकी तरफ देखता है, प्रेत उसी को चोट पहुंचाते हैं। यदि हम अपने काम में लगे रहंे, तो प्रेत सामने से गुÊार जाएंगे और हमें पता भी नहीं चलेगा। अच्छा, अब मैं जा रहा हूं।’ इतना कहकर वीरभान खेतों की ओर चल दिया। घर में खाली बैठी ज्योति को डर लगने लगा। उसने सोचा, ‘मुझे काम करते रहना चाहिए, इससे प्रेत की नजर मुझ पर नहीं जाएगी।’ इच्छा के विपरीत वो काम करती रही। वह डर से खाली भी नहीं बैठ सकती थी। उसने मन में सोचा,‘वीरभान के आने से पहले क्यों न खाना ही बना लिया जाए।’ उस रात का खाना ज्योति ने बना लिया। वीरभान जब घर आया तो देखा, पूरा घर साफ होने के साथ-साथ रात का खाना भी बन गया है। ये देखकर वो बहुत ही खुश हुआ। ज्योति ने बताया,‘आज प्रेत नहीं आए, मैं काम में जुटी रही।’ ‘शायद वो बगल से निकल गए होंगे।’ वीरभान ने उत्तर दिया। इसके बाद तो ये दिनचर्या बन गई। किसान और वीरभान खेत में काम करते और ज्योति प्रेत के डर से घर का सारा काम करती। उसका स्वभाव बदल गया। दो महीने गुजर गए। एक दिन जमींदार अपनी पत्नी के संग ज्योति से मिलने आए। ज्योति को देख वो दंग रह गए, वो भाग-भागकर घर का काम कर रही है। उसके शरीर में बिलकुल भी आलस नहीं था। माता-पिता को देखकर ज्योति उनके गले से लिपट गई। फिर बोली,‘पिता जी हमारे यहां कुछ काम करिए।’ उसने अपनी मां से भी यही कहा। उसे डर था कि प्रेत कहीं माता-पिता को नुकसान न पहुंचा दे। जमींदार को बेटी की बात माननी पड़ी, वो आंगन में रखे भूसे को घर में रखने लगे। शाम को जब वीरभान और उसके पिता खेत से लौटे, तो दोनों अचंभित खड़े देखते रह गए।। किसान ने जमींदार से क्षमा मांगी। जमींदार बोला, ‘मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। घर में घुसते ही ज्योति ने मुझे काम में लग जाने को कहा।’ वीरभान कुछ बोलता इससे पहले ही ज्योति बोल पड़ी,‘यदि आप काम नहीं करते तो प्रेत आपको हानि पहुंचा सकते थे।’ ‘प्रेत?’ जमींदार की पत्नी ने पूछा। ‘हां-हां, यहां से प्रेत गुजरते हैं!’ ज्योति बोली। जमींदार ने वीरभान से कहा,‘मुझे अच्छा नहीं लगता, मेरी बेटी इतना काम करे, तुमने नौकरों को क्यों लौटाया?’ वीरभान ने उत्तर दिया,‘विवाह के बाद लड़की पर उसके पति का अधिकार होता है, पिता का नहीं। जब हम स्वयं इतनी मेहनत करते हैं, तो इसका भी कर्तव्य बनता है, कि ये भी हमारा साथ दे, और ऋण चुकाने में हमारी मदद करे।’ जमींदार बोला ‘पर वो ऋण तो मैंने ज्योति के विवाह के समय ही माफ कर दिया था।’ वीरभान ने कहा,‘मैं आपके पैसे अवश्य ही लौटाऊंगा। हमें दूसरों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए।’ जमींदार की पत्नी ने पूछा,‘बेटा वे प्रेत कौन-से हैं, जिनकी बात ज्योति कर रही है?’ वीरभान बोला,‘माताजी, पहला प्रेत है आलस्य! यदि ज्योति आलस कर बैठी रहती, तो इसे आलस्य का प्रेत नोंच डालता। दूसरा प्रेत है आपका ये ऋण! जब तक मनुष्य अपना ऋण न चुका दे उसे चैन नहीं आता।’ वीरभान की बातें सुनकर जमींदार प्रसन्न हुए। उसकी पत्नी बोली,‘बेटा, तुमने मेरी बेटी का उद्धार कर दिया। अब मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं।’ अब ज्योति को भी असली प्रेतों की पहचान हो गई थी। उसने वीरभान से कहा,‘अब हम दूसरों पर कभी आश्रित नहीं रहेंगे।’ इसके बाद तीनों ने मेहनत करके जमींदार का ऋण भी चुका दिया। साभार:- सीपियां (सी बी टी प्रकाशन)
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