""
Showing posts with label निबंध व जीवनी. Show all posts
Showing posts with label निबंध व जीवनी. Show all posts

Thursday, 13 April 2017

Amulya Khabar

Dr. Bhimrao Ambedkar Biography in Hindi...डॉ. भीमराव अंबेडकर की जीवनी...





Read More

Monday, 3 April 2017

Amulya Khabar

Narendra Modi Biography in Hindi>>नरेन्द्र मोदी की जीवनी







Narendra Modi Biography in Hindi...नरेन्द्र मोदी की जीवनी...
Posted on 04.04.2017 By:Deep Singh Yadav 

 भारत के वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का जन्म तत्कालीन बॉम्बे राज्य के महेसाना जिला स्थित वडनगर ग्राम में हीराबेन मोदी और दामोदरदास मूलचन्द मोदी के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में 17 सितम्बर 1950 को हुआ था।  भारत के राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें 26 मई 2014 को भारत के प्रधानमन्त्री पद की शपथ दिलायी। वे स्वतन्त्र भारत के15वें प्रधानमन्त्री बने तथा इस पद पर आसीन होने वाले स्वतंत्र भारत में जन्मे प्रथम व्यक्ति हैं।
उनके नेतृत्व में भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा और 282 सीटें जीतकर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। एक सांसद के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी एवं अपने गृहराज्य गुजरात के वडोदरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और दोनों जगह से जीत दर्ज़ की।

इससे पूर्व वे गुजरात राज्य के 14वें मुख्यमन्त्री रहे। उन्हें उनके काम के कारण गुजरात की जनता ने लगातार 4 बार (2001 से 2014 तक) मुख्यमन्त्री चुना। गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त नरेन्द्र मोदी विकास पुरुष के नाम से जाने जाते हैं और वर्तमान समय में देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से हैं।। माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर भी वे सबसे ज्यादा फॉलोअर वाले भारतीय नेता हैं। टाइम पत्रिका ने मोदी को पर्सन ऑफ़ द ईयर 2013 के 42 उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया है।

अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नरेन्द्र मोदी एक राजनेता और कवि हैं। वे गुजराती भाषा के अलावा हिन्दी में भी देशप्रेम से ओतप्रोत कविताएँ लिखते हैं।

 वह पूर्णत: शाकाहारी हैं। भारत पाकिस्तान के बीच द्वितीय युद्ध के दौरान अपने तरुणकाल में उन्होंने स्वेच्छा से रेलवे स्टेशनों पर सफ़र कर रहे सैनिकों की सेवा की। युवावस्था में वह छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुए | उन्होंने साथ ही साथ भ्रष्टाचार विरोधी नव निर्माण आन्दोलन में हिस्सा लिया। एक पूर्णकालिक आयोजक के रूप में कार्य करने के पश्चात् उन्हें भारतीय जनता पार्टी में संगठन का प्रतिनिधि मनोनीत किया गया। किशोरावस्था में अपने भाई के साथ एक चाय की दुकान चला चुके मोदी ने अपनी स्कूली शिक्षा वड़नगर में पूरी की। उन्होंने आरएसएस के प्रचारक रहते हुए 1980 में गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर परीक्षा दी और एम॰एससी॰ की डिग्री प्राप्त की।
अपने माता-पिता की कुल 6 संतानों में तीसरे पुत्र नरेन्द्र मोदी ने बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में अपने पिता का भी हाथ बँटाया। बड़नगर के ही एक स्कूल मास्टर के अनुसार नरेन्द्र मोदी हालाँकि एक औसत दर्ज़े के छात्र थे, लेकिन वाद-विवाद और नाटक प्रतियोगिताओं में उनकी बेहद रुचि थी। इसके अलावा उसकी रुचि राजनीतिक विषयों पर नयी-नयी परियोजनाएँ प्रारम्भ करने की भी थी।

13 वर्ष की आयु में नरेन्द्र मोदी की सगाई जसोदा बेन चमनलाल के साथ कर दी गयी और जब उनका विवाह हुआ, वह मात्र 17 वर्ष के थे। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार पति-पत्नी ने कुछ वर्ष साथ रहकर बिताये। परन्तु कुछ समय बाद वे दोनों एक दूसरे के लिये अजनबी हो गये क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने उनसे कुछ ऐसी ही इच्छा व्यक्त की थी। जबकि नरेन्द्र मोदी के जीवनी-लेखक ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि...
"उन दोनों की शादी जरूर हुई परन्तु वे दोनों एक साथ कभी नहीं रहे। शादी के कुछ बरसों बाद नरेन्द्र मोदी ने घर त्याग दिया और एक प्रकार से उनका वैवाहिक जीवन लगभग समाप्त ही हो गया।"

पिछले चार विधान सभा चुनावों में अपनी वैवाहिक स्थिति पर खामोश रहने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अविवाहित रहने की जानकारी देकर उन्होंने कोई पाप नहीं किया। नरेन्द्र मोदी के मुताबिक एक शादीशुदा के मुकाबले अविवाहित व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार तरीके से लड़ सकता है क्योंकि उसे अपनी पत्नी, परिवार व बालबच्चों की कोई चिन्ता नहीं रहती। हालांकि नरेन्द्र मोदी ने शपथ पत्र प्रस्तुत कर जसोदाबेन को अपनी पत्नी स्वीकार किया है।

नरेन्द्र
मोदी जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ, उन्होंने शुरुआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलायी और भारतीय जनता पार्टी का जनाधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभायी। गुजरात में शंकरसिंह वाघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी की ही रणनीति थी।

अप्रैल 1990 में जब केन्द्र में मिली जुली सरकारों का दौर शुरू हुआ तो नरेन्द्र मोदी की मेहनत रंग लायी, जब गुजरात में 1994 के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर सरकार बना ली। इसी दौरान दो राष्ट्रीय घटनायें और इस देश में घटीं। पहली घटना थी सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की रथयात्रा जिसमें आडवाणी के प्रमुख सारथी की भूमिका में नरेन्द्र मोदी का बहुत सहयोग रहा। इसी प्रकार कन्याकुमारी से लेकर सुदूर उत्तर में स्थित काश्मीर तक की मुरली मनोहर जोशी की दूसरी रथ यात्रा भी नरेन्द्र मोदी की ही देखरेख में आयोजित हुई। इसके बाद शंकरसिंह वाघेला ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया, जिसके परिणामस्वरूप केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमन्त्री बना दिया गया और नरेन्द्र मोदी को दिल्ली बुला कर भाजपा में संगठन की दृष्टि से केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व सौंपा गया।
1994 में राष्ट्रीय मन्त्री के नाते उन्हें पाँच प्रमुख राज्यों में पार्टी संगठन का काम दिया गया जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।1998 में उन्हें पदोन्नत करके राष्ट्रीय महामन्त्री (संगठन) का उत्तरदायित्व दिया गया। इस पद पर वह अक्टूबर 2001 तक काम करते रहे। भारतीय जनता पार्टी ने अक्टूबर 2001में केशुभाई पटेल को हटाकर गुजरात के मुख्यमन्त्री पद की कमान नरेन्द्र मोदी को सौंप दी।

2001 में केशुभाई पटेल की सेहत बिगड़ने लगी थी और भाजपा चुनाव में कई सीट हार रही थी। इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुख्यमंत्री के रूप में मोदी को नए उम्मीदवार के रूप में रखते हैं। हालांकि भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी, मोदी के सरकार चलाने के अनुभव की कमी के कारण चिंतित थे। मोदी ने पटेल के उप मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव ठुकरा दिया और आडवाणी व अटल बिहारी वाजपेयी से बोले कि यदि गुजरात की जिम्मेदारी देनी है तो पूरी दें अन्यथा न दें। 3 अक्टूबर 2001 को यह केशुभाई पटेल के जगह गुजरात के मुख्यमंत्री बने। इसके साथ ही उन पर दिसम्बर 2002 में होने वाले चुनाव की पूरी जिम्मेदारी भी थी।

नरेन्द्र मोदी ने मुख्यमंत्री का अपना पहला कार्यकाल 7 अक्टूबर 2001 से शुरू किया। इसके बाद मोदी ने राजकोट विधानसभा चुनाव लड़ा। जिसमें काँग्रेस पार्टी के आश्विन मेहता को 14,728 मतों से हरा दिया।

नरेन्द्र मोदी अपनी विशिष्ट जीवन शैली के लिये समूचे राजनीतिक हलकों में जाने जाते हैं। उनके व्यक्तिगत स्टाफ में केवल तीन ही लोग रहते हैं, कोई भारी-भरकम अमला नहीं होता। लेकिन कर्मयोगी की तरह जीवन जीने वाले मोदी के स्वभाव से सभी परिचित हैं इस नाते उन्हें अपने कामकाज को अमली जामा पहनाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती।  उन्होंने गुजरात में कई ऐसे हिन्दू मन्दिरों को भी ध्वस्त करवाने में कभी कोई कोताही नहीं बरती जो सरकारी कानून कायदों के मुताबिक नहीं बने थे। हालाँकि इसके लिये उन्हें विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों का कोपभाजन भी बनना पड़ा, परन्तु उन्होंने इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं की; जो उन्हें उचित लगा करते रहे। वे एक लोकप्रिय वक्ता हैं, जिन्हें सुनने के लिये बहुत भारी संख्या में श्रोता आज भी पहुँचते हैं। कुर्ता-पायजामा व सदरी के अतिरिक्त वे कभी-कभार सूट भी पहन लेते हैं। अपनी मातृभाषा गुजराती के अतिरिक्त वह हिन्दी में ही बोलते हैं।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2012 में हुए गुजरात विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। भाजपा को इस बार 115 सीटें मिलीं।

प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार...

गोआ में भाजपा कार्यसमिति द्वारा नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोक सभा चुनाव अभियान की कमान सौंपी गयी थी।13 सितम्बर 2013 को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में आगामी लोकसभा चुनावों के लिये प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। इस अवसर पर पार्टी के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी मौजूद नहीं रहे और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसकी घोषणा की। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद चुनाव अभियान की कमान राजनाथ सिंह को सौंप दी। प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद नरेन्द्र मोदी की पहली रैली हरियाणा प्रान्त के रिवाड़ी शहर में हुई।

पार्टी की ओर से पीएम प्रत्याशी घोषित किये जाने के बाद नरेन्द्र मोदी ने पूरे भारत का भ्रमण किया। इस दौरान तीन लाख किलोमीटर की यात्रा कर पूरे देश में 437 बड़ी चुनावी रैलियाँ, 3-डी सभाएँ व चाय पर चर्चा आदि को मिलाकर कुल 5827 कार्यक्रम किये। चुनाव अभियान की शुरुआत उन्होंने 26 मार्च 2014 को मां वैष्णो देवी के आशीर्वाद के साथ जम्मू से की और समापन मंगल पाण्डे की जन्मभूमि बलिया में किया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात भारत की जनता ने एक अद्भुत चुनाव प्रचार देखा। यही नहीं नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के चुनावों में अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त की।
एक सांसद प्रत्याशी के रूप में उन्होंने देश की दो लोकसभा सीटों वाराणसी तथा वडोदरा से चुनाव लड़ा और दोनों निर्वाचन क्षेत्रों से विजयी हुए।
20 मई 2014 को संसद भवन में भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित भाजपा संसदीय दल एवं सहयोगी दलों की एक संयुक्त बैठक में जब लोग प्रवेश कर रहे थे तो नरेन्द्र मोदी ने प्रवेश करने से पूर्व संसद भवन को ठीक वैसे ही जमीन पर झुककर प्रणाम किया जैसे किसी पवित्र मन्दिर में श्रद्धालु प्रणाम करते हैं। संसद भवन के इतिहास में उन्होंने ऐसा करके समस्त सांसदों के लिये उदाहरण पेश किया। बैठक में नरेन्द्र मोदी को सर्वसम्मति से न केवल भाजपा संसदीय दल अपितु एनडीए का भी नेता चुना गया। राष्ट्रपति ने नरेन्द्र मोदी को भारत का 15 वाँ प्रधानमन्त्री नियुक्त करते हुए इस आशय का विधिवत पत्र सौंपा। नरेन्द्र मोदी ने सोमवार 26  मई 2014को प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली।

Read More

Sunday, 2 April 2017

Amulya Khabar

Yogi Adityanath Biography in Hindi>>योगी आदित्यनाथ की जीवनी






Yogi Adityanath Biography in Hindi...योगी आदित्यनाथ की जीवनी...Posted on 03.04.2017 By: Deep Singh Yadav

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मूल नाम अजय सिंह बिष्ट है। उनका जन्म 5 जून 1972 को हुआ। योगी जी गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मन्दिर के महन्त एवं  राजनेता हैं तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। इन्होंने 19 मार्च 2017 को प्रदेश के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत के बाद उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमन्त्री पद की शपथ ली। वे 1998 से लगातार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं, और 2014 लोकसभा चुनाव में भी यहीं से सांसद चुने गए थे। योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मन्दिर के पूर्व महन्त अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं। ये हिन्दू युवाओं के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी समूह हिन्दू युवा वाहिनी के संस्थापक भी हैं, तथा इनकी छवि कथित तौर पर एक कट्टर हिन्दू नेता की रही है।
5 जून 1972 को उत्तराखण्ड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के पौड़ी गढ़वाल जिले स्थित यमकेश्वर तहसील के पंचूड़ गाँव के गढ़वाली राजपूत परिवार में योगी आदित्यनाथ का जन्म हुआ। इनके पिता का नाम आनन्द सिंह बिष्ट हैं जो कि एक फॉरेस्ट रेंजर थे, तथा इनकी माँ का नाम सावित्री देवी है। अपनी माता-पिता की सात संतानों में तीन बड़ी बहनों व एक बड़े भाई के बाद ये पाँचवीं संतान हैं एवं इनसे और दो छोटे भाई हैं।

इन्होंने 1977 में टिहरी के गजा के स्थानीय स्कूल में पढ़ाई शुरू की व 1987 में यहाँ से दसवीं की परीक्षा पास की। सन् 1989 में ऋषिकेश के श्री भरत मन्दिर इण्टर कॉलेज से इन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। 1990 में स्नातक की पढ़ाई करते हुए ये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। 1992 में श्रीनगर के हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से इन्होंने गणित में बीएससी की परीक्षा पास की। कोटद्वार में रहने के दौरान इनके कमरे से सामान चोरी हो गया था जिसमें इनके  प्रमाण पत्र भी थे। इस कारण से गोरखपुर से विज्ञान स्नातकोत्तर करने का इनका प्रयास असफल रह गया। इसके बाद इन्होंने ऋषिकेश में पुनः विज्ञान स्नातकोत्तर में प्रवेश तो लिया लेकिन राम मंदिर आंदोलन का प्रभाव और प्रवेश को लेकर परेशानी से उनका ध्यान अन्य ओर बंट गया। 1993 में गणित में एमएससी की पढ़ाई के दौरान गुरु गोरखनाथ पर शोध करने ये गोरखपुर आए और गोरखपुर प्रवास के दौरान ही ये महंत अवैद्यनाथ के संपर्क में आए थे जो इनके पड़ोस के गाँव के निवासी और परिवार के पुराने परिचित थे। अंततः ये महंत की शरण में ही चले गए और दीक्षा ले ली। 1994 में ये पूर्ण संन्यासी बन गए, जिसके बाद इनका नाम अजय सिंह बिष्ट से योगी आदित्यनाथ हो गया।
योगी आदित्यनाथ 12 सितंबर 2014 को गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महन्त अवैद्यनाथ के निधन के बाद  यहाँ के महंत बने। 2 दिन बाद उन्हें नाथ पंथ के पारंपरिक अनुष्ठान के अनुसार मंदिर का पीठाधीश्वर बनाया गया।
सबसे पहले 1998 में योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से भाजपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़े और जीत गए। तब इनकी उम्र केवल 26 वर्ष थी। वे बारहवीं लोक सभा (1998-99) के सबसे युवा सांसद थे। 1999 में ये गोरखपुर से पुनः सांसद चुने गए।

 यह भी पढ़ें...Self Improvement in Hindi...ये काम आपकी जिन्दगी को बर्बाद कर सकते हैं...

अप्रैल 2002 में इन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी बनायी। 2004 में तीसरी बार लोकसभा का चुनाव जीता। 2009 में ये 2 लाख से ज्यादा वोटों से जीतकर लोकसभा पहुंचे। 2014 में पांचवी बार एक बार फिर से दो लाख से ज्यादा वोटों से जीतकर ये सांसद चुने गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत मिला, इसके बाद उत्तर प्रदेश में 12 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इसमें योगी आदित्यनाथ से काफी प्रचार कराया गया, लेकिन परिणाम निराशाजनक रहा। 2017 में विधानसभा चुनाव में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने योगी आदित्यनाथ से पूरे राज्य में प्रचार कराया। इन्हें एक हेलीकॉप्टर भी दिया गया।
19 मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश के बीजेपी विधायक दल की बैठक में योगी आदित्यनाथ को विधायक दल का नेता चुनकर मुख्यमंत्री पद सौंपा गया।

योगी आदित्यनाथ के भारतीय जनता पार्टी के साथ रिश्ता एक दशक से ज्यादा पुराना है। वह पूर्वी उत्तर प्रदेश में अच्छा खासा प्रभाव रखते हैं। इससे पहले उनके पूर्वाधिकारी तथा गोरखनाथ मठ के पूर्व महन्त, महन्त अवैद्यनाथ भी भारतीय जनता पार्टी से 1991 तथा 1996 का लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं।
योगी आदित्यनाथ सबसे पहले 1998 में गोरखपुर से चुनाव भाजपा प्रत्याशी के तौर पर लड़े और तब उन्होंने बहुत ही कम अंतर से जीत दर्ज की। लेकिन उसके बाद हर चुनाव में उनका जीत का अंतर बढ़ता गया और वे 1999, 2004, 2009 तथा 2014 में सांसद चुने गए। इन्होंने अप्रैल 2002 मे हिन्दू युवा वाहिनी बनायी।
7 सितम्बर 2008 को योगी आदित्यनाथ पर आजमगढ़ में जानलेवा हिंसक हमला हुआ था। इस हमले में वे बाल-बाल बचे। यह हमला इतना बड़ा था कि सौ से भी अधिक वाहनों को हमलावरों ने घेर लिया और लोगों को लहूलुहान कर दिया। योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर दंगों के दौरान तब गिरफ्तार किया गया जब मुस्लिम त्यौहार मोहर्रम के दौरान फायरिंग में एक हिन्दू युवा की जान चली गयी। जिलाधिकारी ने बताया कि वह बुरी तरह जख्मी है। तब अधिकारियों ने योगी को उस जगह जाने से मना कर दिया परन्तु योगी आदित्यनाथ उस जगह पर जाने को अड़ गए। तब उन्होंने शहर में लगे कर्फ्यू को हटाने की माँग की थी। अगले दिन उन्होंने शहर के मध्य श्रद्धाञ्जलि सभा का आयोजन करने की घोषणा की लेकिन जिलाधिकारी ने इसकी अनुमति देने से मना कर दिया। आदित्यनाथ ने भी इसकी चिंता नहीं की और हजारों समर्थकों के साथ अपनी गिरफ़्तारी दी। योगी आदित्यनाथ को सीआरपीसी की धारा 151A, 146, 147, 279, 506 के तहत जेल भेज दिया गया। उन पर कार्यवाही का असर हुआ कि मुंबई-गोरखपुर गोदान एक्सप्रेस के कुछ डिब्बे फूंक दिए गए, जिसका आरोप उनके संगठन हिन्दू युवा वाहिनी पर लगाया गया।

यह दंगे पूर्वी उत्तर प्रदेश के छह जिलों और तीन मंडलों में भी फैल गए। उनकी गिरफ़्तारी के अगले दिन जिलाधिकारी हरि ओम और पुलिस प्रमुख राजा श्रीवास्तव का तबादला हो गया। कथित रूप से योगी आदित्यनाथ के ही दबाव के कारण मुलायम सिंह यादव की उत्तर प्रदेश सरकार को यह कार्यवाही करनी पड़ी।

योगी धर्मांतरण के खिलाफ और घर वापसी के लिए काफी चर्चा में रहे। 2005 में योगी आदित्यनाथ ने कथित तौर पर 1800 ईसाइयों का शुद्धीकरण कर हिन्दू धर्म में शामिल कराया। ईसाइयों के इस शुद्धीकरण का काम उत्तर प्रदेश के एटा जिले में किया गया था।

योगी आदित्यनाथ ने रविवार, 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। शपथ समारोह लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में हुआ। इनके साथ दो उप-मुख्यमंत्री भी बनाये गए हैं। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार दो उप-मुख्यमंत्री बने हैं। समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुये। मंच पर अखिलेश यादव और मुलायम सिंह भी मौजूद रहे।

Read More

Tuesday, 6 December 2016

Amulya Khabar

Jaylalita Biography in Hindi >> जयललिता की जीवनी

Jaylalita Biography in Hindi...जयललिता की जीवनी
Posted On 07.12.2016 By: Deep Singh Yadav 

 नाम‍‌- जयललिता जयराम
माता- संध्या
पिता- जयराम
जन्म-24 फरवरी 1948
मृत्यु-05 दिसम्बर 2016


जयललिता का जन्म 24  फरवरी 1948 को एक अय्यर परिवार में मैसूर राज्य  जो कि अब कर्नाटक का हिस्सा है के मांडया जिले के पांडवपुरा तालुक के मेलुरकोट गाँव में हुआ था। जयललिता के दादा मैसूर राज्य में सर्जन थे। जब वो 2 साल की थीं तब उनके पिता का देहांत हो गया। पिता की मृत्यु के बाद उनकी माँ उन्हें लेकर अपने माता पिता के पास  बंगलौर चली गईं। उनकी शिक्षा पहले बंगलौर और फिर चेन्नई में हुई। उन्होंने आगे की पढ़ाई सरकारी वजीफे से पूरी की।

जब वे स्कूल मे पढ़ रहीं थी तभी उन्होंने "एपिसल" नाम की एक अंग्रेजी फिल्म में काम किया। वे 15 वर्ष की आयु से फिल्मों में काम करने लगीं थी। उन्होंने पहले कन्नड़ फिर बाद में तमिल फिल्मों में काम किया। स्कर्ट पहन कर फिल्मों में काम करने वाली वह पहली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थी। 1965 से 1972 के दौर में उन्होंने ज्यादातर फिल्में एम. जी. रामचन्द्रन के साथ की। कन्नड़ भाषा में उनकी पहली फिल्म "चिन्नाडा गोम्बे" थी जो 1964 में प्रदर्शित हुई। तमिल सिनेमा में उन्होंने जाने माने निर्देशक श्रीधर की फिल्म "वेन्नीरादई" से अपने करियर को शुरु किया। जयललिता ने लगभग ३०० फिल्मों में काम किया। उन्होंने हिंदी फिल्मों में धर्मेन्द्र सहित कई अभिनेताओं के साथ काम किया लेकिन उनकी अधिकतर फिल्में शिवाजी गणेशन और एम. जी. रामचन्द्रन के साथ ही आई।जयललिता द्वारा अभिनीत हिंदी फिल्में "मनमौजी 1962" एंव "इज्जत 1968" हैं।

जयललिता 1982 में आल इण्डिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पार्टी की सदस्य बनी और अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत एम. जी. रामचन्द्रन के साथ की। 1983 में उन्हें पार्टी का प्रचार सचिव नियुक्त किया गया। बाद में पार्टी प्रमुख एम. जी. रामचन्द्रन ने उन्हें राज्यसभा भिजवाया और उसके बाद विधान सभा उपचुनाव में जितवाकर विधान सभा सदस्य बनवाया। 1984 से 1989 तक वो तमिलनाडु से राज्य सभा सदस्य बनी रहीं।
पार्टी के कुछ नेताओं ने उनके और एम. जी. रामचन्द्रन के बीच दरार पैदा कर दी। उस समय जयललिता एक तमिल पत्रिका में अपने निजी जीवन के बारे में लिखती थी, ऐसा करने से एम. जी. रामचन्द्रन ने उन्हें रोका था। 1984 में मस्तिष्क स्ट्रोक के चलते रामचन्द्रन काम करने के काबिल नहीं रहे तो जयललिता ने मुख्यमंत्री का पद  सम्भालना चाहा, लेकिन रामचन्द्रन ने उन्हें पार्टी के उप नेता के पद से भी हटा दिया।

पार्टी प्रमुख एम.जी. रामचन्द्रन का निधन 1987 में हो गया। उसके बाद पार्टी के दो हिस्से हो गये। एक धड़े की नेता जयललिता और दूसरे धड़े की नेता रामचन्द्रन की विधवा जानकी रामचन्द्रन थी। जयललिता ने अपने आप को रामचन्द्रन की विरासत का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।1989 के विधान सभा चुनाव में जयललिता की पार्टी ने 27 सीटें जीतें और वे तमिलनाडु की नेता विरोधी दल बनी।
1991 में राजीव गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस से गठबंधन करके चुनाव लड़ा और सरकार बनाई। वो राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री रहीं। उन्होंने लड़कियों के लिए "क्रेडल बेबी स्कीम" शुरु की ताकि अनाथ और बेसहारा बालिकाओं के जीवन में खुशहाली आ सके। उन्होंने तमिलनाडु में ऐसे थाने खोले जहाँ सिर्फ महिलाओं की ही तैनाती की जाती थी।

1996 के चुनाव में वे खुद व उनकी पार्टी दोनों चुनाव हार गये। दूसरी सरकार बनने पर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुए। उन्होंने स्वंय शादी नहीं की थी लेकिन अपने दत्तक पुत्र वी. एन. सुधाकरण की शादी में पानी की तरह पैसे बहाए। कोर्ट से सजा होने के बाद भी वह अपनी प्रार्टी को चुनाव जिताने में सफल रहीं। इस समय उन्हें काफी कठिन दौर से गुजरना पड़ा।


2001 के चुनाव में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। जयललिता बिना चुनाव लड़ें मुख्यमंत्री बनी। दोबारा सत्ता में आने के बाद उन्होंने लाटरी टिकट पर पाबंदी लगा दी। हड़ताल पर जाने की वजह से दो लाख कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। किसानों की मुफ्त बिजली रोक दी, चावल मँहगा कर दिया। 5000 रु० से ज्यादा कमाने वालों के राशन कार्ड निरस्त  कर  दिए। बस का किराया बढ़ा दिया। मंदिरों में पशु बलि पर रोक लगा दी।


भ्रष्टाचार के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया। इसी कारण उन्हें अपनी कुर्सी अपने विश्वासपात्र मंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम को सौंपनी पड़ी। जब मद्रास हाई कोर्ट से राहत मिली तो उन्होंने पुनः अपनी कुर्सी सम्भाली, लेकिन 2014 के लोक सभा चुनाव में वे बुरी तरह हार गई। उसके बाद उन्होने पशु बलि की पुनः अनुमति दी और किसानों को भी दोबारा मुफ्त बिजली देनी शुरु की।
जयललिता को   मद्रास विश्वविद्यालय से 1991 में डॉक्टरेट की मानद उपाधि मिली और उसके बाद उन्हें कई बार मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 1997 में उनके जीवन पर बनी एक तमिल फिल्म 'इरूवर' आई थी जिसमें जयललिता की भूमिका ऐश्वर्या राय ने निभाई थी।

 अप्रैल 2011  में विधान सभा में बहुमत हासिल किया और वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बनी। उन्होंने 16 मई 2011 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और मृत्यु होने तक अर्थात 05 दिसम्बर 2016 तक तमिलनाडु राज्य की मुख्यमंत्री रहीं।


Read More

Saturday, 19 November 2016

Amulya Khabar

Indira Gandhi Biography in Hindi >>> इंदिरा गाँधी की जीवनी

Related image
Indira Gandhi Biography in Hindi... इंदिरा गाँधी की जीवनी
Posted On 19.11.2016 By: Deep Singh Yadav

नाम-- इंदिरा गाँधी
पति-- फिरोज गाँधी
माता-पिता-- कमला नेहरु एंव जवाहरलाल नेहरु
संतान-- संजीव गाँधी एंव राजीव गाँधी
जन्म- मृत्यु-- 19 नवम्बर 1917, 31 अक्टूबर 1984

इन्दिरा का जन्म 19 नवम्बर 1917 को  नेहरू परिवार में हुआ था। इनके पिता जवाहरलाल नेहरू और इनकी माता कमला नेहरू थीं।इनके पितामह मोतीलाल नेहरू एक प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे। इनके पिता जवाहरलाल नेहरू भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे जो आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री रहे।

इंदिरा के अत्यंत प्रिय दिखने के कारण पंडित नेहरु उन्हें 'प्रियदर्शिनी' के नाम से संबोधित किया करते थे। चूँकि पं० जवाहरलाल नेहरु और कमला नेहरु स्वयं बेहद सुंदर तथा आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे,इस कारण सुंदरता उन्हें अपने माता-पिता से प्राप्त हुई थी। इन्दिरा को उनका 'गांधी' उपनाम फिरोज गांधी से विवाह के बाद मिला था। इंदिरा गांधी को बचपन में भी एक स्थिर पारिवारिक जीवन का अनुभव नहीं मिल पाया था। इसकी वजह यह थी कि 1936 में 18 वर्ष की उम्र में ही उनकी मां कमला नेहरू का तपेदिक के कारण एक लंबे संघर्ष के बाद निधन हो गया था और पिता हमेशा स्वतंत्रता आंदोलन में व्यस्त रहे।  

1934–35 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात, इन्दिरा  ने शान्तिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही इन्हे "प्रियदर्शिनी" नाम दिया था। इसके पश्चात यह इंग्लैंड चली गईं और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठीं, परन्तु यह उसमे विफल रहीं और ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में कुछ महीने बिताने के पश्चात, 1937 में परीक्षा में सफल होने के बाद इन्होने सोमरविल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में दाखिला लिया। इस समय के दौरान इनकी अक्सर फिरोज़  से मुलाकात होती थी, जिन्हे यह इलाहाबाद से जानती थीं और जो लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में अध्ययन कर रहे थे। अंततः 16 मार्च 1942 को आनंद भवन, इलाहाबाद में एक निजी आदि धर्म ब्रह्म-वैदिक समारोह में इनका विवाह फिरोज़ से हुआ।

ऑक्सफोर्ड से वर्ष 1941 में भारत वापस आने के बाद वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल हो गयीं।
1950 के दशक में वे अपने पिता के भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल के दौरान गैर सरकारी तौर पर एक निजी सहायक के रूप में उनके सेवा में रहीं। इंदिरा ने बचपन से ही अपने घर पर राजनैतिक माहौल देखा था। उनके पिता और दादा भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। इस माहौल का प्रभाव इंदिरा पर भी पड़ा। उन्होंने युवा लड़के-लड़कियों के मदद से एक वानर सेना बनाई, जो विरोध प्रदर्शन और झंडा जुलूस के साथ-साथ संवेदनशील प्रकाशनों तथा प्रतिबंधित सामग्रीओं का परिसंचरण भी करती थी। वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल हो गयीं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें सितम्बर 1942 में गिरफ्तार कर लिया गया जिसके बाद सरकार ने उन्हें मई 1943 में रिहा किया। अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1964 में उनकी नियुक्ति एक राज्यसभा सदस्य के रूप में हुई। इसके बाद वे लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं।

 1959 और 1960 के दौरान इंदिराभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं।
उनके पिता का का देहांत 27 मई, 1964 को हुआ और इंदिरा नए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की प्रेरणा से चुनाव लड़ीं और लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में   सूचना और प्रसारण मंत्री बनाई गई। इस तरह सरकार में शामिल हुईं।  ताशकंद में सोवियत मध्यस्थता में पाकिस्तान के अयूब खान के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटे बाद ही लालबहादुर शास्त्री का निधन हो गया।तब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के. कामराज ने शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

 सन् 1966 में जब श्रीमती गाँधी प्रधानमंत्री बनीं उस समय कांग्रेस दो गुटों में विभाजित हो चुकी थी, श्रीमती गांधी के नेतृत्व में समाजवादी और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में रूढीवादी। मोरारजी देसाई उन्हें "गूंगी गुड़िया" कहा करते थे। 1967 के चुनाव में आंतरिक समस्याएँ उभरी जहां कांग्रेस लगभग 60 सीटें खोकर 545 सीटोंवाली लोक सभा में 297 सीटें प्राप्त की। उन्हें मोरार जी देसाई को भारत का उप प्रधानमंत्री एंव वित्त मंत्री बनाया। 1969 में देसाई के साथ अनेक मुददों पर असहमति के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विभाजित हो गयी।  जुलाई 1969 को उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।

लालबहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद तत्कालीन काँग्रेस पार्टी अध्यक्ष के. कामराज इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने में निर्णायक रहे। गाँधी ने शीघ्र ही चुनाव जीतने के साथ-साथ जनप्रियता के माध्यम से विरोधियों के ऊपर हावी होने की योग्यता दर्शायी। 1971 के भारत-पाक युद्ध में एक निर्णायक जीत के बाद की अवधि में अस्थिरता की स्थिति में उन्होंने सन् 1975 में आपातकाल लागू किया। काँग्रेस पार्टी ने 1977 के आम चुनाव में पहली बार हार का सामना किया। सन् 1980 में सत्ता में पुनः वापसी हुई।



गाँधी की सरकार को उनकी 1971 के जबरदस्त जनादेश के बाद कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।   सन् 1971 में उन्होंने  गरीबी हटाओ का नारा दिया। गरीबी हटाओ के तहत कार्यक्रम, हालाँकि स्थानीय रूप से चलाये गये, परन्तु उनका वित्तपोषण, विकास, पर्यवेक्षण एवं कर्मिकरण नई दिल्ली तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा किया गया।

राज नारायण द्वारा दायर एक चुनाव याचिका में कथित तौर पर भ्रष्टाचार  के आरोपों के आधार पर 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन्दिरा गांधी के लोक सभा चुनाव को रद्द घोषित कर दिया। इस प्रकार अदालत ने उनके विरुद्ध संसद का आसन छोड़ने तथा छह वर्षों के लिए चुनाव में भाग लेने पर प्रतिबन्ध का आदेश दिया। प्रधानमन्त्रीत्व के लिए लोक सभा (भारतीय संसद के निम्न सदन) या राज्य सभा (संसद के उच्च सदन) का सदस्य होना अनिवार्य है।

 16 वर्ष तक देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गाँधी के शासनकाल में कई उतार-चढ़ाव आए। लेकिन 1975 में आपातकाल 1984 में सिख दंगा जैसे कई मुद्दों पर इंदिरा गाँधी को भारी विरोध-प्रदर्शन और तीखी आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी थी। बावजूद इसके रूसी क्राँति के साल में पैदा हुईं इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में विश्व शक्तियों के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को परास्त किया औरबांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया। लेकिन 31 अक्‍तूबर 1984 को उन्हें अपने अंगक्षक की ही गोली का शिकार होना पड़ा और वह देश की एकता और अखंडता के लिए कुर्बान हो गईं।



सितम्बर 1981 में जरनैल सिंह भिंडरावाले का अलगाववादी सिख आतंकवादी समूह सिख धर्म के पवित्रतम तीर्थ, हरिमन्दिर साहिब परिसर के भीतर तैनात हो गया। स्वर्ण मंदिर परिसर में हजारों नागरिकों की उपस्थिति के बावजूद गाँधी ने आतंकवादियों का सफाया करने के एक प्रयास में सेना को धर्मस्थल में प्रवेश करने का आदेश दिया।   इन्दिरा गांधी के  अंगरक्षकों में से दो थे सतवंत सिंह और बेअन्त सिंह, दोनों ने ३१ अक्टूबर 1984 को 1, सफदरजंग रोड, नई दिल्ली में स्थित प्रधानमंत्री निवास के बगीचे में इंदिरा गांधी की  हत्या की।   बेअंत सिंह ने अपने शस्त्र का उपयोग कर उनपर तीन बार गोलियाँ चलाई और सतवंत सिंह ने  कारबाईन से उन कर  बाईस राउन्ड गोलियाँ चलाईं। उनके अन्य अंगरक्षकों द्वारा बेअंत सिंह को गोली मार दी गई और सतवंत सिंह को गोली मारकर गिरफ्तार कर लिया गया।



गाँधी को उनकी सरकारी कार से अस्पताल पहुँचाते समय ही रास्ते में उन्होंने दम तोड़ दिया, लेकिन घंटों तक उनकी मृत्यु घोषित नहीं की गई। उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उनका ऑपरेशन किया। उनका अंतिम संस्कार 3 नवंबर को राज घाट के समीप हुआ और यह जगह शक्ति स्थल के रूप में जानी जाती है। उनकी मौत के बाद पूरे देश में  में सांप्रदायिक अशांति फैल गई और हजारों सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया।

इंदिरा गाँधी एक अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व वाली महिला थी, भारतवासी हों या  सारा सँसार विशेष रूप से विश्वभर की नारियाँ इनको कभी नहीं भूल सकतीं।हमारे देश की हर महिला को श्रीमती इंदिरा गाँधी जैसा काम करना चाहिए, उनके जैसा बनना चाहिए, जिससे हिंदुस्तान का मस्तक सम्पूर्ण विश्व में ऊँचा रहे।




Read More

Monday, 14 November 2016

Amulya Khabar

Guru Nanak Biography in Hindi >>> गुरु नानक देव जी की जीवनी

Image result for guru nanak images
Guru Nanak Biography in Hindi... गुरु नानक देव जी की जीवनी
Posted on 14.11.2016 By: Deep Singh Yadav 

नाम --  नानक । 
प्रसिध्द नाम -- गुरु नानक देव जी ।
पिता का नाम -- कल्याणचंद या मेहता कालू ।
माता का नाम --  तृप्ता देवी ।
जन्म --  15 अप्रैल, 1469 ।
पत्नी  --  सुलक्खनी ।
परलोकवास (मृत्यु) --  22 सितम्बर, 1539, करतारपुर,  पाकिस्तान ।


 गुरू नानक सिखों के प्रथम गुरु  हैं। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, गुरु नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। लद्दाख व तिब्बत में इन्हें नानक लामा भी कहा जाता है। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे। लोगों को बेहद सरल भाषा में समझाया सभी इंसान एक दूसरे के भाई है। ईश्वर सबके पिता है, फिर एक पिता की संतान होने के बावजूद हम ऊंच-नीच कैसे हो सकते है?  



इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गाँव में कार्तिकी पूर्णिमा को हुआ था। कुछ  इनकी जन्मतिथि 15 अप्रैल, 1469  हैं।  प्रचलित तिथि कार्तिक पूर्णिमा है, जो अक्टूबर-नवंबर में दीवाली के 15 दिन बाद पड़ती है।इनके पिता का नाम कल्याणचंद या मेहता कालू जी था, माता का नाम तृप्ता देवी था। तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। इनकी बहन का नाम नानकी था।


 उनका परिवार कृषि करके आमदनी करते था। गुरुनानक का जहाँ जन्म हुआ  वह स्थान आज उन्हीं के नाम पर अब ननकाना के नाम से जाना जाता है। ननकाना अब पाकिस्तान में है। बचपन से प्रखर बुद्धिवाले नानक देव सिख धर्म के संस्थापक हैं।   

 बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन से ही ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढ़ने लिखने में इनका मन नहीं लगा।7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया क्योंकि भगवत्प्रापति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक ने हार मान ली तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ने आ गए। तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएं घटी जिन्हें देखकर गाँव के लोग इन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानने लगे। बचपन के समय से ही इनमें श्रद्धा रखने वालों में इनकी बहन नानकी तथा गाँव के शासक राय बुलार प्रमुख थे।


उनके पिता बाबा मेहताकालू  और माता तृप्ता नें उनका नाम नानक रखा। उनके पिता गाँव में स्थानीय राजस्व प्रशासन के अधिकारी थे। अपने बाल्य काल में श्री गुरु नानक जी नें कई प्रादेशिक भाषाएँ सीखीं जैसे- फारसी और अरबी। इनका विवाह सोलह वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहने वाले मूला की कन्या सुलक्खनी से वर्ष 1487 में हुआ था।  था। 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म  वर्ष 1491 में हुआ और चार वर्ष बाद दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म वर्ष 1496 में हुआ।    वर्ष 1485 में अपने भैया और भाभी के कहने पर उन्होंने दौलत खान लोधी के स्टोर में अधिकारी के रूप में निकुक्ति ली जो की सुल्तानपुर में मुसलमानों का शासक था।

 मक्के में मुसलमानों का एक प्रसिद्ध पूजा स्थान है जिसे काबा कहते है गुरु जी रात के समय काबे की तरफ विराज गए तब जिओन ने गुस्से में आकर गुरु जी से कहा कि तू कौन काफ़िर है जो खुदा के घर की तरफ पैर पसारकर सोया हुआ है?

गुरु जी ने बड़ी नम्रता के साथ कहा, मैं यहाँ सरे दिन के सफर से थककर लेटा हूँ, मुझे नहीं मालूम की खुदा का घर किधर है तू हमारे पैर पकड़कर उधर करदे जिधर खुदा का घर नहीं है। यह बात सुनकर जिओन ने बड़े गुस्से में आकर गुरु जी के चरणों को घसीटकर दूसरी ओर कर दिया और जब चरणों को छोड़कर देखा तो उसे काबा भी उसी तरफ ही नजर आने लगा। इस प्रकार उसने जब फिर चरण दूसरी तरफ किए तो काबा उसी और ही घुमते हुआ नज़र आया।

जिओन ने जब यहे देखा कि काबा इनके चरणों के साथ ही घूम जाता है तो उसने यह बात हाजी और मुलानो को बताई जिससे बहुत सारे लोग वहाँ एकत्रित हो गए।गुरु जी के इस कौतक को देखकर सभी दंग रहगए और गुरु जी के चरणों पर गिर पड़े,उन्होंने गुरु जी से माफ़ी भी माँगी।जब गुरु जी ने वहाँ से चलने की तैयारी की तो काबे के पीरों ने विनती करके गुरु जी की एक खड़ाऊ निशानी के रूप में अपने पास रख ली।


जब गुरु नानक जी उम् 12 वर्ष की थी  तब उनके पिता ने उन्हें 20 रूपए दिए और अपना  व्यापार शुरू करने के लिए कहा ताकि वे व्यापार के बारे में कुछ सीख सकें। परन्तु गुरु नानक जी नें उन 20 रूपये से गरीब और संत व्यक्तियों खाना खिला दिया। जब उनके पिता नें उनसे पुछा – तुम्हारे व्यापार का क्या हुआ? तो उन्होंने उत्तर दिया – मैंने उन रुपयों का सच्चा व्यापार कर लिया।


 जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ। स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा आदि करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर आश्वन कृष्ण 10, संवत् 1597 (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को इनका परलोकवास हुआ।प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर गुरुनानक जयंती मनाई जाती है। 

मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।
गुरु नानक देव जी के  सिद्धांत :
* ईश्वर एक है।

* सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो।
* जगत का कर्ता सब जगह और सब प्राणी मात्र में मौजूद है।
* सर्वशक्तिमान ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।

* ईमानदारी से मेहनत करके उदरपूर्ति करनी चाहिए।

* बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को परेशान करें।
* हमेशा प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने को क्षमाशीलता मांगना चाहिए।

* मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके उसमें से जरूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।
* सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं।

* भोजन शरीर को जिंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है। 


Read More

Saturday, 12 November 2016

Amulya Khabar

Donald Trump Biography in Hindi >>> अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जीवनी

Image result for donald trump image
Donald Trump Biography in Hindi...अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जीवनी
Posted On 12.11.2016 By: Deep Singh Yadav

  नाम  - डोनाल्ड जॉन ट्रम्प (Donald Trump – President Of America)
जन्म - 14 जून, 1946
राष्ट्रीयता - अमेरिकन
उपलब्धि - अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति (President), व्यवसायी, लेखक, टीवी कलाकार
पिता ‍-  फ्रेड ट्रम्‍प
माता  -  मरियम ऐनी


डोनाल्ड ट्रम्प  अमेरिका के व्यवसायी, लेखक, टीवी कलाकार, और अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के रूप में जाने जाते हैं। उनका रियल स्टेट का भी बहुत बड़ा  व्यवसाय  हैं।  वे अपने अनाप शनाप भाषणों के वजह से भी मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं।  ट्रम्प का सम्बंध किसी राजनीतिक घराने से  नहीं है।  उन्होंने जो कुछ भी किया अपनी दम पर किया । 

ट्रम्प का जन्म 14 जून, 1946 को क्वींस, न्यूयार्क सिटी में हुआ था। इनके माता-पिता का नाम मरियम ऐनी और फ्रेड ट्रम्‍प है । प्रेस्बिटेरियन ईसाई धर्म को मानते हैं। ये अर्थशास्त्र में डिग्रीधारी हैं। ट्रम्प ने तीन शादियाँ की हैं। पहली शादी इवाना (पूर्व ओलिंपिक खिलाड़ी ) से की थी। 1977 में हुई यह शादी 1991 तक चली। इसके बाद 1993 में मार्ला (अभिनेत्री) को जीवन साथी बनाकर 1999 में तलाक ले लिया। इसके बाद 2005 में मेलानिया (मॉडल) से शादी की है। पहली पत्‍नी इवाना से डोनाल्ड ट्रम्‍प जूनियर, इवानका ट्रम्‍प और एरिक ट्रम्‍प, दूसरी पत्‍नी मार्ला से टिफ़नी ट्रम्‍प, तीसरी पत्‍नी मेलानिया से विलियम ट्रम्‍प नामक बच्चे हैं। फोडर्म विश्वविद्यालय और पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के वार्टन स्कूल ऑफ फाइनेंस एंड कॉमर्स से इन्होंने पढ़ाई की। कॉलेज के समय से ही पिता की कंपनी में ट्रम्प ने काम की शुरुआत कर दी थी।ट्रम्प के पिता और दादा दादी जर्मन आप्रवासियों रहे थे। उनके दादा जी ने 1885 मे अमेरिकन नागरिकता प्राप्त कर ली। 

 ट्रम्प ने अपने व्यापार की शुरुआत अपने पिता के साथ साझा व्यापार के रूप में ब्रूकलिन न्यू यॉर्क से शुरू की। शुरू में अपने पिता की पसंदीदा मध्यमवर्गीय किराये की मकान में ब्रुकलिन, क्वींस और स्टॅटन द्वीप के क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया। लेकिन पिता की इच्छा के कारण  उन्होंने 1971 मे खुद का रियल स्टेट व्यापार की शुरुआत की। जिसका नाम उन्होने मनहट्टन रियल स्टेट रखा।ट्रम्प ने फिफ्थ एवेन्यू गगनचुम्बी इमारत, ६१० पार्क एवेन्यू, टम्प विश्व टावर,ट्रम्प पार्क,ट्रम्प प्लाजा,ट्रम्प पैलेस आदि का निर्माण करवाया।उन्होने कई इमारतो को  डिज़ाइन भी किया, इसके लिए ट्रम्प को कई अवॉर्ड भी मिल चुके हैं।

 ट्रम्प ने बताया – मैं अपने पिता को अपना आदर्श मानता हूँ। मैने अपने पिता के साथ लगभग 5 साल तक व्यापार किया। जब वे अपने क्लाइंट के साथ डील करने मे व्यस्त रहते थे तब मैं बहुत ध्यान से उनकी बात सुना करता था। मैने उनसे निर्माण कार्य के बारे मे बहुत जानकारी हासिल की। ट्रम्प बताते हैं कि मेरे पिता मुझे  लकी मानते थे। उनके अनुसार जब भी मैं उनके साथ रहता था तो उनकी बहुत अच्छी डील होती थी।

एक समय ऐसा भी आया जब ट्रम्प पर ऋण का बोझ बढ़ गया। ये अस्सी दशक की बात हैं उस समय मंदी का दौर चल रहा था। ट्रम्प भी इस मंदी के दौर में फस गये , लेकिन ये समय ज़्यादा समय तक नही चला. ट्रम्प इस दौर से  बाहर आ गये और अपने कारोबार को बहुत आगे ले गये।

डोनाल्ड ट्रम्प ने   तीन शादियाँ की। सबसे पहले 1977 में इवाना से जिससे 1992 में तलाक़ हो गया। उस समय ट्रम्प की काफ़ी आलोचना हुई थी। इसके बाद 1993 मे प्रसिद्ध अभिनेत्री मरला मेपल्स से शादी की जिनसे अफेर के चर्चे काफ़ी पहले से थे। मेपल्स ने ट्रम्प के बेटे को जन्म दिया जो कि ट्रम्प की चौथी संतान थी। ये शादी भी ज़्यादा दिन तक नहीं चली और 1999 में दोंनो में तलाक़ हो गया। इस तलाक़ में ट्रम्प को 2 बिलियन डॉलर मरला को देना पड़ा।  बाद मे 2005 में ट्रम्प ने मशहूर मॉडल मेलनिया कनौस से शादी की जिनसे उन्हें पाँचवीं संतान 2006 में हुई।

 डोनाल्ड ट्रम्प ने  राजनीतिक जीवन की शुरुआत  1999 में रिफ़ॉर्म पोलिटिकल पार्टी के माध्यम से सन् 2000 के राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में शामिल होकर की। दुर्भाग्यवश व्यापार में कुछ परेशानियों के कारण 2000 में ही ट्रम्प को वापस अपने व्यापार का रुख करना पड़ा।2012 मे इन्होंने फिर से राजनीतिक की तरफ रुख़ किया और राष्ट्रपति के चुनाव के लिए खुद को उम्मीदवार घोषित किया। ट्रम्प ने हमेशा ही राष्ट्रपति बराक ओबामा को आड़े हाथ लिया। राजनैतिक मुद्दों में भी उन्होंने बराक ओबामा के खिलाफ बयान दिया। ट्रम्प अपनी बेबाकी   और कटु आलोचना के लिए भी जाने जाते हैं।

16 जून 2015 को डोनाल्ड ट्रम्प ने  स्वंय को रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से टिकट मिलने के बाद राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया। उनके खिलाफ हिलेरी क्लिंटन थी। इसके बाद अरबपति   ट्रंप ने सभी बाधाओं को पार करते हुए काँटे के चुनावी मुकाबले में  हिलेरी क्लिंटन को मात दी। ट्रंप को 288 मत और  हिलेरी को 215 मत मिले,और इस तरह डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति निर्वाचित घोषित हुए।


Read More

Friday, 11 November 2016

Amulya Khabar

Pandit Jawaharlal Nehru Essay in Hindi /Children's Day >>> पंडित जवाहरलाल नेहरु पर हिंदी निबंध व जीवनी /बाल दिवस

Image result for bal divas,jawaharlal nehru imageImage result for bal divas,jawaharlal nehru imageImage result for bal divas,jawaharlal nehru image

Pandit Jawaharlal Nehru Essay in Hindi /Children's Day...पंडित जवाहरलाल नेहरु पर हिंदी निबंध व जीवनी /बाल दिवस...
Posted On 11.11.2016 By: Deep Singh Yadav 

 पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्म 14 नवम्वर 1889 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम मोती लाल नेहरु और माता का नाम स्वरुप रानी नेहरु था। पंडित जवाहरलाल नेहरु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। उन्हें बच्चों से विशेष लगाव था और बच्चे भी उन्हें बहुत प्यार करते थे। नेहरु जी के जन्म दिन को ही बाल दिवस के रुप मे प्रतिवर्ष बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । बाल दिवस बच्चों को समर्पित भारत का राष्ट्रीय त्योहार है। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश का उचित मार्गदर्शन किया था।   


 बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई थी। जब बच्चों के कल्याण पर 'विश्व कांफ्रेंस' में बाल दिवस मनाने की सर्वप्रथम घोषणा हुई। 1954 में दुनिया भर में इसे मान्यता मिली।   बाल दिवस के शुभ अवसर पर भारत सरकार एंव राज्य सरकार बच्चों के भविष्य के लिए कई कार्यक्रमों की घोषणाएं करती हैं। बच्चों के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए। इन्हें स्वस्थ, निर्भीक और सुयोग्य नागरिक बनाने का प्रयास होना चाहिए। यही बाल दिवस का संदेश है। 


 पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्म 14 नवम्वर 1889 को इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम मोती लाल नेहरु और माता का नाम स्वरुप रानी नेहरु था। पंडित जवाहरलाल नेहरु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। उन्हें बच्चों से विशेष लगाव था और बच्चे भी उन्हें बहुत प्यार करते थे। नेहरु जी के जन्म दिन को ही बाल दिवस के रुप मे प्रतिवर्ष बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । बाल दिवस बच्चों को समर्पित भारत का राष्ट्रीय त्योहार है। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश का उचित मार्गदर्शन किया था।   

 बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई थी। जब बच्चों के कल्याण पर 'विश्व कांफ्रेंस' में बाल दिवस मनाने की सर्वप्रथम घोषणा हुई। 1954 में दुनिया भर में इसे मान्यता मिली।   बाल दिवस के शुभ अवसर पर भारत सरकार एंव राज्य सरकार बच्चों के भविष्य के लिए कई कार्यक्रमों की घोषणाएं करती हैं। बच्चों के रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाना सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए। इन्हें स्वस्थ, निर्भीक और सुयोग्य नागरिक बनाने का प्रयास होना चाहिए। यही बाल दिवस का संदेश है। 


बच्चे ही देश का भविष्य होते हैं,अगर वो पढ़ने लिखने की उम्र में जीवन यापन के लिए काम करेंगे तो उनका भविष्य अधंकारमय हो जायेगा। पढ़ना लिखना सभी का अधिकार है।, जब बच्चे उसे ग्रहण करेगे तभी देश का विकास होगा।बालकों के क्या अधिकार होते हैं ये सभी को पता होना चाहिए और जो बालकों के अधिकारों का हनन करे उसे सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। तभी सही मायनों में बाल दिवस मनानें का उद्देश्य सार्थक होगा।

आईए अब जानते हैं चाचा नेहरु के बारे में जिनके जन्म दिन के शुभ अवसर पर बाल दिवस मनाया जाता है...................

  पं०जवाहरलाल नेहरू ने दुनियाँ  बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, लंदन से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात वर्ष व्यतीत किए

 पं० जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति आकर्षित हुए।

नेहरू ने महात्मा गाँधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

 पं० जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की।   1942 से 1946 के दौरान जब वे अहमदनगर की जेल में थे वहाँ उन्होने ‘भारत एक खोज’ पुस्तक लिखी थी।

 1926 से 1928 तक, जवाहर लाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में कार्य किया। 1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया। उस सत्र में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया। मुद्दे को हल करने के लिए,गाँधी जी ने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि ब्रिटेन को भारत को राज्य का दर्जा देने के लिए दो साल का समय दिया जाएगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक राष्ट्रीय संघर्ष शुरू करेगी।

 दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें पं० जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें 'पूर्ण स्वराज्य' की मांग की गई। 26 जनवरी 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन  सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

जब ब्रिटिश सरकार ने भारत अधिनियम 1935 प्रख्यापित किया तब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। नेहरू चुनाव के बाहर रहे लेकिन ज़ोरों के साथ पार्टी के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। कांग्रेस ने लगभग हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केन्द्रीय असेंबली में सबसे ज्यादा सीटों पर विजय हासिल की।

नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936 और 1937 में चुने गए थे। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भागीदारी की।

 सन् 1947 में भारत को आजादी मिलने पर जब भावी प्रधानमंत्री के लिये कांग्रेस में मतदान हुआ तो सरदार पटेल को सर्वाधिक मत मिले। उसके बाद सर्वाधिक मत आचार्य कृपलानी को मिले थे। किन्तु गाँधी जी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया।

1947 में वे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। अंग्रेजों ने करीब 500 देशी रियासतों को एक साथ स्वतंत्र किया था और उस वक्त सबसे बडी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना। उन्होंने भारत के पुनर्गठन के रास्ते में उभरी हर चुनौती का समझदारी पूर्वक सामना किया। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

 27 मई 1964 को सुबह के समय पं० जवाहर लाल नेहरु  की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, डॉक्टरों ने बताया उन्हे दिल का दौरा पङा है। दोपहर में पं० जवाहर लाल नेहरु  सभी देशवासियें को छोङकर अपने जीवन की अंतिम यात्रा पर चले गये ।

भारत को आजादी दिलाने में पं० जवाहर लाल नेहरु का विशेष योगदान था । देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरु के जन्मदिन पर हार्दिक वदंन, अभिन्नंदन।

Note:  हमें  आशा है कि आपको हमारा यह Article पसंद आया होगा. यदि आपको इसमें कोई भी कमी लगे या आप अपना कोई सुझाव देना चाहें तो आप नीचे Comment ज़रूर कीजिये, इसके इलावा आप अपना कोई भी विचार हमसे comment के ज़रिये साँझा करना मत भूलिए. इस Blog Post को अधिक से अधिक Share कीजिये और यदि आप ऐसे ही अन्य Articles, quotes,Thoughts,Motivational Stories, Biography,Essay, Whatsapp Status, Prerak Prasang, Interesting/Amazing Facts आदि हिन्दी में पढना चाहते हैं तो Free Subscribe ज़रूर कीजिये और हमारे FACE BOOK PAGE को भी  LIKE कीजिये। Thankx.





Read More

Tuesday, 8 November 2016

Amulya Khabar

Anna Hazare biography in hindi >>> अन्ना हजारे की जीवनी


Image result for anna hazare image
Anna Hazare Biography in hindi... अन्ना हजारे की जीवनी...
Posted On 09.11.2016 By: Deep Singh Yadav

 पूरा नाम  –  किसन बापट बाबूराव हजारे जन्म  –  15 जून 1937
जन्मस्थान
  –  रालेगन सिद्धि, अहमदनगर, महाराष्ट्र
पिता  –  बाबूराव हजारे माता  –  लक्ष्मीबाई हजारे
 अन्ना हजारे का पूरा नाम किसन बापट बाबूराव हजारे है लेकिन अधिकांश लोग उन्हें अन्ना हजारे के नाम से ही जानते हैं। अन्ना हजारे का जन्म  15 जून 1937 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के रालेगन_सिद्धि गांव के एक मराठा किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबूराव हजारे और मां का नाम लक्ष्मीबाई हजारे था।[1] उनका बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे तथा दादा सेना में थे। दादा की तैनाती भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पूर्वंजों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मृत्यु के सात वर्षों बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वे दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये के वेतन पर काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।

वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद सरकार की युवाओं से सेना में शामिल होने की अपील पर अन्ना 1963 में सेना की मराठा रेजीमेंट में ड्राइवर के रूप में भर्ती हो गए। अन्ना की पहली नियुक्ति पंजाब में हुई। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अन्ना हजारे खेमकरण सीमा पर नियुक्त थे।12 नवम्बर 1965को चौकी पर पाकिस्तानी हवाई बमबारी में वहां तैनात सारे सैनिक मारे गए। इस घटना ने अन्ना के जीवन को सदा के लिए बदल दिया। इसके बाद उन्होंने सेना में 13 और वर्षों तक काम किया। उनकी तैनाती मुंबई और कश्मीर में भी हुई।1975 में जम्मू में तैनाती के दौरान सेना में सेवा के 15 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली। वे पास के गाँव रालेगन सिद्धि में रहने लगे और इसी गाँव को उन्होंने अपनी सामाजिक कर्मस्थली बनाकर समाज सेवा में जुट गए।1965 के युद्ध में मौत से साक्षात्कार के बाद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उन्होंने स्वामी विवेकानंद की एक पुस्तक 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' खरीदी। इसे पढ़कर उनके मन में भी अपना जीवन समाज को समर्पित करने की इच्छा बलवती हो गई। उन्होंने महात्मा गांधी और विनोबा भावे की पुस्तकें भी पढ़ीं।1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर स्वयं को सामाजिक कार्यों के लिए पूर्णतः समर्पित कर देने का संकल्प कर लिया।

  1978 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर रालेगन आकर उन्होंने अपना सामाजिक कार्य प्रारंभ कर दिया। इस गांव में बिजली और पानी की ज़बरदस्त कमी थी। अन्ना ने गांव वालों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए प्रेरित किया और स्वयं भी इसमें योगदान दिया। अन्ना के कहने पर गांव में जगह-जगह पेड़ लगाए गए। गांव में सौर ऊर्जा और गोबर गैस के जरिए बिजली की सप्लाई की गई। उन्होंने अपनी ज़मीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी और अपनी पेंशन का सारा पैसा गांव के विकास के लिए समर्पित कर दिया। वे  गाँव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं। आज गांव का हर शख्स आत्मनिर्भर है। आस-पड़ोस के गांवों के लिए भी यहां से चारा, दूध आदि जाता है। यह गांव आज शाँति, सौहार्द्र एवं भाईचारे की मिसाल है।

1991 में अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की सरकार के कुछ 'भ्रष्ट' मंत्रियों को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की। ये मंत्री थे- शशिकांत सुतर, महादेव शिवांकर और बबन घोलाप। अन्ना ने उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप लगाया था। सरकार ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अंतत: उन्हें दागी मंत्रियों शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को हटाना ही पड़ा। घोलाप ने अन्ना के खिलाफ़ मानहानि का मुकदमा दायर दिया। अन्ना अपने आरोप के समर्थन में न्यायालय में कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पाए और उन्हें तीन महीने की जेल हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने उन्हें एक दिन की हिरासत के बाद छोड़ दिया। एक जाँच आयोग ने शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को निर्दोष बताया। लेकिन अन्ना हजारे ने कई शिवसेना और भाजपा नेताओं पर भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए।

1997 में अन्ना हजारे ने सूचना का अधिकार अधिनियम के समर्थन में मुंबई के आजाद मैदान से अपना अभियान शुरु किया।9 अगस्त 2003 को मुंबई के आजाद मैदान में ही अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठ गए। 12 दिन तक चले आमरण अनशन के दौरान अन्ना हजारे और सूचना का अधिकार आंदोलन को देशव्यापी समर्थन मिला। आख़िरकार 2003  में ही महाराष्ट्र सरकार को इस अधिनियम के एक मज़बूत और कड़े विधेयक को पारित करना पड़ा। बाद में इसी आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया। इसके परिणामस्वरूप 12 अक्टूबर 2005 को भारतीय संसद ने भी सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया। अगस्त 2006 में सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ अन्ना ने 11 दिन तक आमरण अनशन किया, जिसे देशभर में समर्थन मिला। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने संशोधन का इरादा बदल दिया।

2003 में अन्ना ने कांग्रेस और एनसीपी सरकार के चार मंत्रियों; सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक, विजय कुमार गावित और पद्मसिंह पाटिल को भ्रष्ट बताकर उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी और भूख हड़ताल पर बैठ गए। तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने इसके बाद एक जांच आयोग का गठन किया। नवाब मलिक ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। आयोग ने जब सुरेश जैन के ख़िलाफ़ आरोप तय किए तो उन्हें भी त्यागपत्र देना पड़ा।

जन लोकपाल विधेयक के निर्माण के लिए जारी यह आंदोलन अपने अखिल भारतीय स्वरूप में 5 अप्रैल 2011 को समाजसेवी अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के साथ जंतर-मंतर पर शुरु किए गए अनशन के साथ आरंभ हुआ, जिनमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल, भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध  वकील प्रशांत भूषण, आदि शामिल थे।  इस अनशन का प्रभाव समूचे भारत में फैल गया और इसके समर्थन में लोग सड़कों पर भी उतरने लगे। इन्होंने भारत सरकार से एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक बनाने की माँग की थी और अपनी माँग के अनुरूप सरकार को लोकपाल बिल का एक मसौदा भी दिया था। किंतु मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने इसके प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया और इसकी उपेक्षा की। इसके परिणामस्वरूप शुरु हुए अनशन के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षा पूर्ण ही रहा। लेकिन इस अनशन के आंदोलन का रूप लेने पर भारत सरकार ने आनन-फानन में एक समिति बनाकर संभावित खतरे को टाला और 16 अगस्त तक संसद में लोकपाल विधेयक पारित कराने की बात स्वीकार कर ली। अन्ना हजारे ने इसके खिलाफ अपने पूर्व घोषित तिथि १६ अगस्त से पुनः अनशन पर जाने की बात दुहराई।16 अगस्त को सुबह साढ़े सात बजे जब वे अनशन पर जाने के लिए तैयारी कर रहे थे, तब दिल्ली पुलिस ने उन्हें घर से ही गिरफ्तार कर लिया। उनके टीम के अन्य लोग भी गिरफ्तार कर लिए गए। इस खबर  से आम जनता  सड़कों पर उतरकर सरकार के इस कदम का अहिंसात्मक प्रतिरोध करने लगी। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। अन्ना ने रिहा किए जाने पर दिल्ली से बाहर रालेगाँव चले जाने या ३ दिन तक अनशन करने की बात अस्वीकार कर दी। उन्हें 7 दिनों के न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। शाम तक देशव्यापी प्रदर्शनों की खबर ने सरकार को अपना कदम वापस खींचने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को सशर्त रिहा करने का आदेश जारी किया। मगर अन्ना अनशन जारी रखने पर दृढ़ थे। बिना किसी शर्त के अनशन करने की अनुमति तक उन्होंने रिहा होने से इनकार कर दिया। 17अगस्त तक देश में अन्ना के समर्थन में प्रदर्शन होता रहा। दिल्ली में तिहाड़ जेल के बाहर हजारों लोग डेरा डाले रहे। 17अगस्त की शाम तक दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में 7 दिनों तक अनशन करने की इजाजत देने को तैयार हुई। मगर अन्ना ने 30 दिनों से कम अनशन करने की अनुमति लेने से मना कर दिया. उन्होंने जेल में ही अपना अनशन जारी रखा। अन्ना को रामलीला मैदान में १५ दिन कि अनुमति मिली और १९ अगस्त से अन्ना राम लीला मैदान में जन लोकपाल बिल के लिये आनशन जारी रखने पर दृढ़ थे। आज २४ अगस्त तक तीन मुद्दओ पर सरकार से सहमति नही बन पायी है। अनशन के 10 दिन हो जाने पर भी सरकार अन्ना का अनशन समापत नही करवा पाई | हजारे ने दस दिन से जारी अपने अनशन को समाप्त करने के लिए सार्वजनिक तौर पर तीन शर्तों का ऐलान किया। उनका कहना था कि तमाम सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाया जाए, तमाम सरकारी कार्यालयों में एक नागरिक चार्टर लगाया जाए और सभी राज्यों में लोकायुक्त हो। 74 वर्षीय हजारे ने कहा कि अगर जन लोकपाल विधेयक पर संसद चर्चा करती है और इन तीन शर्तों पर सदन के भीतर सहमति बन जाती है तो वह अपना अनशन समाप्त कर देंगे।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दोनो पक्षों के बीच जारी गतिरोध को तोड़ने की दिशा में पहली ठोस पहल करते हुए लोकसभा में खुली पेशकश की कि संसद अरूणा राय और डॉ॰ जयप्रकाश नारायण सहित अन्य लोगों द्वारा पेश विधेयकों के साथ जन लोकपाल विधेयक पर भी विचार करेगी। उसके बाद विचार विमर्श का ब्यौरा स्थायी समिति को भेजा जाएगा।
  पुरस्कार.....
  • पद्मभूषण पुरस्कार (1992)
  • पद्मश्री पुरस्कार( 1990)
  • इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (1986)
  • महाराष्ट्र सरकार का कृषि भूषण पुरस्कार (1989)
  • यंग इंडिया पुरस्कार
  • मैन ऑफ़ द ईयर अवार्ड (1988)
  • पॉल मित्तल नेशनल अवार्ड (2000)
  • ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंटेग्रीटि अवार्ड (2003)
  • विवेकानंद सेवा पुरुस्कार (1996)
  • शिरोमणि अवार्ड (1997)
  • महावीर पुरुस्कार (1997)
  • दिवालीबेन मेहता अवार्ड (1999)
  • केयर इन्टरनेशनल (1998)
  • बासवश्री प्रशस्ति (2000)
  • GIANTS INTERNATIONAL AWARD (2000)
  • नेशनलइंटरग्रेसन अवार्ड (1999)
  • विश्व-वात्सल्य एवं संतबल पुरस्कार
  • जनसेवा अवार्ड (1999)
  • रोटरी इन्टरनेशनल मनव सेवा पुरस्कार (1998)
  • विश्व बैंक का 'जित गिल स्मारक पुरस्कार' (2008)
  सिर पर गाँधी टोपी और बदन पर खादी है। आंखों पर मोटा चश्मा है, लेकिन उनको दूर तक दिखता है। इरादे फौलादी और अटल हैं। महात्मा गाँधी के बाद अन्ना हजारे ने ही भूख हड़ताल और आमरण अनशन को सबसे ज्यादा बार बतौर हथियार इस्तेमाल किया है। इसके जरिए उन्होंने भ्रष्ट प्रशासन को पद छोड़ने एवं सरकारों को जनहितकारी कानून बनाने पर मजबूर किया है। अन्ना हजारे को आधुनिक युग का गाँधी भी कहा जा सकता है अन्ना हजारे हम सभी के लिये आदर्श हैं।
Note Anna Hazare Biography  in hindi कैसी लगी ?अच्छी लगी हो तो  हमारा  (Facebook) पेज लाइक करें या कोई  comments हो तो नीचे करें। Anna Hazare  Biography in hindi व नई पोस्ट  ईमेल में पाने के लिए Free Subscribe करेंThankx.

 
Read More

Saturday, 29 October 2016

Amulya Khabar

प्रकाश पर्व दीपावली >>> Hindi Essay on Diwali / Deepawali >>> Diwali Essay in Hindi...



प्रकाश पर्व दीपावली... Hindi Essay on Diwali / Deepawali...
Diwali Essay in Hindi...






Read More

Friday, 28 October 2016

Amulya Khabar

प्रकाश पर्व दीपावली >>> Hindi Essay on Diwali / Deepawali >>> Diwali Essay in Hindi

Image result for diwali essay image
 प्रकाश पर्व दीपावली... Hindi Essay on Diwali / Deepawali...
Diwali Essay in Hindi...
Posted On 29.10.2016 By: Deep Singh Yadav 
 दोस्तो, कुछ समय बाद हम भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक “दीपावली” मनाएंगे। परम पिता परमेश्वर की कृपा से आप सबके लिए यह पर्व मंगलमय हो
दोस्तो,हम सभी जानते हैं कि त्योहार मानव-जीवन का एक अभिन्न अंग हैं, | भारत में  त्योहार की भरमार हैभारत को त्योहारों की भूमि कहा जाता है। रोशनी से अंधकार दूर हो जाता है।  इसी तरह मन में अच्‍छे विचारों को प्रकाशित कर हम मन के अंधकार को दूर कर सकते हैं। इस त्योहार में कई  संस्कार, परंपराएं और सांस्कृतिक मान्यताएं हैं।इसको मनाने के लिये बच्चे बेहद उत्साहित रहते हैं और इससे जुड़ी सभी गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।

दीवाली या दीपावली अर्थात 'रोशनी का त्योहार' हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है। दीवाली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।
भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है।  ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं तथा सिख समुदाय इसे बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।

माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे।अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से हर्षित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं।  दीपावली दीपों का त्योहार है।  सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय, तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।
 दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' अर्थात 'दिया' व 'आवली' अर्थात 'लाइन' या 'श्रृंखला' के मिश्रण से हुई है। इसके उत्सव में घरों के द्वारों, घरों व मंदिरों पर लाखों प्रकाशकों को प्रज्वलित किया जाता है। दीपावली जिसे दिवाली भी कहते हैं उसे अन्य भाषाओं में अलग-अलग नामों से पुकार जाता है

दीवाली का पद्म पुराण और स्कन्द पुराण नामक संस्कृत ग्रंथों में उल्लेख मिलता है  दीये (दीपक) को स्कन्द पुराण में सूर्य के हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है, सूर्य जो जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा का लौकिक दाता है और जो हिन्दू कैलंडर अनुसार कार्तिक माह में अपनी स्तिथि बदलता है।कुछ क्षेत्रों में हिन्दू दीवाली को यम और नचिकेता की कथा के साथ भी जोड़ते हैं।नचिकेता की कथा जो सही बनाम गलत, ज्ञान बनाम अज्ञान, सच्चा धन बनाम क्षणिक धन आदि के बारे में बताती है; पहली सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व उपनिषद में दर्ज़ की गयी है।
7 वीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में राजा हर्ष ने इसे दीपप्रतिपादुत्सव: कहा है जिसमें दिये जलाये जाते थे और नव दुल्हन और दूल्हे को तोहफे दिए जाते थे। 9 वीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका कहा है जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों सजाया जाता था।फारसी यात्री और इतिहासकार अल बेरुनी, ने भारत पर अपने 11 वीं सदी के संस्मरण में, दीवाली को कार्तिक महीने में नये चंद्रमा के दिन पर हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार कहा है।

 लोग अपने घरों को साफ कर उन्हें उत्सव के लिए सजाते हैं। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।
दीपावली नेपाल और भारत में सबसे बड़े शॉपिंग सीजन में से एक है; इस दौरान लोग कारें और सोने के गहनों के रूप में भी महंगे आइटम तथा स्वयं और अपने परिवारों के लिए कपड़े, उपहार, उपकरणों, रसोई के बर्तन आदि खरीदते हैं। लोग अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों को उपहार स्वरुप आम तौर पर मिठाइयाँ व सूखे मेवे देते हैं। इस दिन बच्चे अपने माता-पिता और बड़ों से अच्छाई और बुराई या प्रकाश और अंधेरे के बीच लड़ाई के बारे में प्राचीन कहानियों, कथाओं, मिथकों के बारे में सुनते हैं। इस दौरान लड़कियाँ और महिलाऐं खरीदारी के लिए जाती हैं और फर्श, दरवाजे के पास और रास्तों पर रंगोली और अन्य रचनात्मक पैटर्न बनाती हैं। युवा और वयस्क आतिशबाजी और प्रकाश व्यवस्था में एक दूसरे की सहायता करते हैं।
क्षेत्रीय आधार पर प्रथाओं और रीति-रिवाजों में बदलाव पाया जाता है। धन और समृद्धि की देवी - लक्ष्मी या एक से अधिक देवताओं की पूजा की जाती है। दीवाली की रात को, आतिशबाजी आसमान को रोशन कर देती है। 


प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण में बताया गया है कि, कई लोग दीपावली को 14 साल के वनवास पश्चात भगवान राम व पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण की वापसी के सम्मान के रूप में मानते हैं। अन्य प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत अनुसार कुछ दीपावली को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप में मानते हैं। कई हिंदू दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ मानते हैं। दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे शादी की। लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश; संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं कुछ दीपावली को विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के दिन के रूप में मनाते है। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं और जो लोग उस दिन उनकी पूजा करते है वे आगे के वर्ष के दौरान मानसिक, शारीरिक दुखों से दूर सुखी रहते हैं।
भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में हिन्दू लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं, और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में, गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) की दावत में कृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है
भारत के कुछ पश्चिम और उत्तरी भागों में दीवाली का त्योहार एक नये हिन्दू वर्ष की शुरुआत का प्रतीक हैं।
दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए।

 दीपावली के दिन भारत में विभिन्न स्थानों पर मेले लगते हैं।
  दीपावली एक दिन का पर्व नहीं अपितु पर्वों का समूह है। दशहरे के पश्चात ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार आता है। इस दिन बाज़ारों में चारों तरफ़ जनसमूह उमड़ पड़ता है।  दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है अतैव प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार कुछ न कुछ खरीदारी करता है। इस दिन तुलसी या घर के द्वार पर एक दीपक जलाया जाता है। इससे अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली होती है। इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। अगले दिन दीपावली आती है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बाज़ारों में खील-बताशे, मिठाइयाँ, खांड़ के खिलौने, लक्ष्मी-गणेश आदि की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं। स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दूकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग रिश्तेदारों, मित्रों, सगे-संबंधियों के घर मिठाइयाँ व उपहार बाँटने लगते हैं। दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक व मोमबत्तियाँ जलाकर रखते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अत्यंत सुंदर दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार व गलियाँ जगमगा उठते हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखों व आतिशबाज़ियों का आनंद लेते हैं। रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ, आतिशबाज़ियाँ व अनारों के जलने का आनंद प्रत्येक आयु के लोग लेते हैं। देर रात तक कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णिमा से भी से भी अधिक प्रकाशयुक्त दिखाई पड़ती है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पर्वत अपनी अँगुली पर उठाकर इंद्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बनाया था। इसी दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर पूजा करते हैं। अगले दिन भाई दूज का पर्व होता है।भाई दूज या भैया द्वीज को यम द्वितीय भी कहते हैं। इस दिन भाई और बहिन गांठ जोड़ कर यमुना नदी में स्नान करने की परंपरा है। इस दिन बहिन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उसके मंगल की कामना करती है और भाई भी प्रत्युत्तर में उसे भेंट देता है। दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी अपने पुराने बहीखाते बदल देते हैं। वे दूकानों पर लक्ष्मी पूजन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से धन की देवी लक्ष्मी की उन पर विशेष अनुकंपा रहेगी। कृषक वर्ग के लिये इस पर्व का विशेष महत्त्व है। खरीफ़ की फसल पक कर तैयार हो जाने से कृषकों के खलिहान समृद्ध हो जाते हैं। कृषक समाज अपनी समृद्धि का यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाता हैं।

 अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है।



Read More

Thursday, 27 October 2016

Amulya Khabar

About Ratan Tata in Hindi >>> Ratan Tata Profile in Hindi >>> प्रोफाइल‍‍: रतन टाटा

Ratan Tata Pictures, Images, Photos, Wallpapers & Biography
About Ratan Tata in Hindi...Ratan Tata Profile in Hindi...प्रोफाइल‍‍: रतन टाटा
Posted On 27.10.2016 By:Deep Singh Yadav

 रतन नवल टाटा भारत के जाने माने बिजनेसमैन, इंवेस्टर, फिलोंथ्रोपिस्ट (ऐसा इंसान जो बड़े दान देकर बड़े पैमाने पर सोशलवर्क करता है) और टाटा संस के अंतरिम चैयरमैन हैं। वे टाटा ग्रुप (मुंबई बेस्डग्लोबलबिजनेस कोंग्लोमेरेट) के 1991 से 2012 तक चैयरमैन रहे और 24 अक्टूबर 2016 को उन्होंने फिर इस पद को संभाल लिया। यह अंतरिम टर्म है और रतन टाटा इस ग्रुप के चैरिटेबल ट्र्स्ट के भी प्रमुख बने रहेंगे। रतन टाटा पद्मविभूूषण (साल 2008) और पद्मभूूषण (साल 2000) में नवाज़े जा चुके हैं।
   बचपन और शिक्षा  :  28 दिसंबर 1937 को जन्मे रतन टाटा, नवल टाटा के सुपुत्र हैं। रतन टाटा के पिता नवल टाटा को जेएन पेटिट पारसी अनाथालय से नवाजबाई टाटा ने गोद लिया थ। रतन टाटा के पिता नवल और मां सोनू 1940के मध्य में अलग हो गए। इस समय रतन टाटा की उम्र दस वर्ष थी और उनके छोटेे भाई, जिम्मी, सात वर्ष के थे। दोनों बच्चों की परवरिश उनकी दादी नवाजबाई टाटा ने की। 


   रतन टाटा के एक हॉफ ब्रदर (एक पेरेंट कॉमन ) नोएल टाटा, नवल टाटा की दूसरी शादी (जो सिमोन टाटा के साथ हुई थी) से जन्मे थे। रतन टाटा की शिक्षा मुंबई के  कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल में हुई।  उनके पास कॉर्नेल यूूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर में स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में बीएस डिग्री है। यह उन्होंने 1962 में प्राप्त की। एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम रतन टाटा ने 1975 में हार्वड बिजनेस स्कूल से पूरा किया। 


करियर  : रतन टाटा ने अपने करियर की शुरुआत टाटा ग्रुप के साथ 1961 में की। अपने करियर की शुरुआत में, रतन टाटा टाटा स्टील के शॉप फ्लोर पर लाइमस्टोन को हटाने और धमाके भट्टी को हैंडल करने का काम करते थे। टाटा ने नाल्को में हाई टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट बनाने की शुरुआत करने के लिए पैसा लगाने का सुझाव जेआरडी टाटा को दिया। अब तक इस कंपनी में सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक्स ही बनाए जाते थे और कंपनी काफी घाटे में चल रहीथी। जेआरडी टाटा इस सलाह से बहुत खुश नहीं थे, परंतु उन्हें इस पर अमल किया और आगे चलकर कंपनी काफी फायदे में चलने लगी।   
 1991 में जेआरडी टाटा ने टाटा संस का चैयरमैन पद छोड़ दिया और रतन टाटा को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। जब टाटा ने अपने नए ऑफिस को संभाला, कंपनी में उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। कई कंपनियों के प्रमुख, जिन्होंने कई दशक टाटा ग्रुप से जुड़कर खर्च किए थे, काफी ताकतवर और प्रभावी हो गए थे। 

रतन टाटा ने इन प्रमुखों को एक उम्र निर्धारित कर  (रिटायरमेंट एज) पद से हटाने की मुहिम शुरू की। इसके अलावा कई कंपनियों को ग्रुप के साथ जोडा, जिन्हें टाटा ग्रुप के ब्रांड का इस्तेमाल कर लाभ को टाटा ग्रुप के साथ शेयर करना था। टाटा ने नवीनता को प्रमुखता दी और युवा टैलेंट को अपने साथ जोडा और उन्हें जिम्मेदारियां दीं।    

उपलब्धियां :  अपने 21 साल के कार्यकाल में रतन टाटा ने टाटा ग्रुप की आमदनी को 40 गुना अधिक कर दिया और टाटा ग्रुप के लाभ को 50 गुना पहुंचा दिया। जब उन्होंने टाटा के ग्रुप की कमान संभाली थी, तब लाभ चीज़ेंबेचकर होती थीं और जब टाटा ने ग्रुप छोड़ा, तब आमदनी का जरिया टाटा ब्रांड बन चुका था।   

 रतन टाटा की कमान लेते ही टाटा ग्रुप ने टाटा टी ब्रांड के तले टीटले, टाटा मोटर्स के तले जगुआर लैंड रोवर और टाटा स्टील के तले कोरस खरीदे। इन खरीदियों के बाद टाटा ग्रुप भारत के बहुत बड़े ब्रांड से ग्लोबसबिज़नेस में दाखिल हुआ। इस ग्रुप का 65 प्रतिशत रैवेन्यू करीब 100 देशों में फैले बिजनेस से आने लगा। टाटा की नैनो कार, रतन टाटा की सोच का नतीजा है। रतन टाटा ने कहा भी है कि नैनो का कांसेप्ट क्रांतिकारी रहा। इसके भारतीय बाज़ार में आने से एवरेज इंडियन खरीदार के बजट के अनुसार कारों की कीमत रखी जाने लगी।   

 75 साल के होने पर रतन टाटा ने टाटा ग्रुप के चेयरमैन का पद दिसंबर 2012 को त्याग दिया और 44 साल के साइरस मिस्त्री को टाटा संस का नया चेेयरमैन नियुक्त किया। साइरस मिस्त्री शापूरजी पलोंजी ग्रुप के मालिक पलोंजी मिस्त्री के सुपुत्र हैं। 24 अक्टूबर 2016 को साइरस मिस्त्री को उनके पद से हटा दिया गया और एक बार फिर रतन टाटा ने ग्रुप की बागडोर संभाल ली। 

  नए   फैसले  : हाल ही में रतन टाटा ने अपनी पर्सनल सैविंग स्नेपडील में डाली। स्नेपडील भारत की तेजी से बढ़ती हुई ई-कॉमर्स वेबसाइट है। 2016 में टाटा ने खुलासा न करते हुए, टीबॉक्स (एक ऑनलाइन सेलिंग स्टोर, जिसमें चाय की बिक्री होती है) में इंवेस्टमेंट किया। इसके अलावा कैशकरो.कॉम में भी टाटा ने पैसे लगाए हैं।
  
Read More

Saturday, 27 August 2016

Amulya Khabar

Biography of Mother Teresa in hindi >>> मदर टेरेसा की जीवनी



Image result for mother teresa image

 Biography of Mother Teresa in hindi...

मदर टेरेसा की जीवनी...

Posted On 27.08.2016 By: Deep Singh Yadav 

 

करुणा और सेवा की साकार मूर्ति मदर टेरेसा का जन्म 26अगस्त 1910 एंव मृत्यु 5 सितम्बर1997 को हुई थी। अग्नेसे गोंकशे बोजशियु के नाम से एक अल्बेनीयाई परिवार में उस्कुब, ओटोमन साम्राज्य (आज का सोप्जे, मेसेडोनिया गणराज्य) में हुआ था। मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं, जिनके पास भारतीय नागरिकता थी। उन्होंने 1950 में कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी की स्थापना की। 45 सालों तक गरीब, बीमार, अनाथ और मरते हुए इन्होंने लोगों की मदद की और साथ ही चेरिटी के मिशनरीज के प्रसार का भी मार्ग प्रशस्त किया।
1970 तक वे ग़रीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्द हो गयीं, माल्कोम मुगेरिज के कई वृत्तचित्र और पुस्तक जैसे समथिंग ब्यूटीफुल फॉर गोड में इसका उल्लेख किया गया। उन्होंने 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा के जीवनकाल में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी का कार्य लगातार विस्तृत होता रहा और उनकी मृत्यु के समय तक यह123 देशों में 610 मिशन नियंत्रित कर रही थी। इसमें एचआईवी/एड्स, कुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं/ घर शामिल थे और साथ ही सूप रसोई, बच्चों और परिवार के लिए परामर्श कार्यक्रम, अनाथालय और विद्यालय भी थे। मदर टेरसा की मृत्यु के बाद उन्हें पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया और उन्हें कोलकाता की धन्य की उपाधि प्रदान की।

यह भी पढ़ें...Biography of Bhagat Singh in hindi >>> अमर शहीद सरदार भगत सिंह की जीवनी


  मदर टेरेसा के पिता बचपन में ही चल बसे। बाद में उनका लालन-पालन उनकी माता ने किया। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी मदर (गोंझा) टेरेसा एक सुन्दर जीवंत,अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं।

पढ़ना,गीत गाना वह विशेष पसंद करती थीं। वह और उनकी बहन आच्च गिरजाघर में प्रार्थना की मुख्य गायिका थीं। बाद में गोंझा को एक नया नाम‘सिस्टर टेरेसा’दिया गया जो इस बात का संकेत था कि वह एक नया जीवन शुरू करने जा रही हैं। यह नया जीवन एक नए देश में जोकि उनके परिवार से काफी दूर था,सहज नहीं था लेकिन सिस्टर टेरेसा ने ऐसा किया वह भी बड़ी शांति के साथ।

बाल्यकाल में ही मदर टेरेसा के हृदय में विराट करुणा का बीज अंकुरित हो उठा था। मात्र अठारह वर्ष की उम्र में दीक्षा लेकर वे सिस्टर टेरेसा बनी थीं।


 वे 1929 में यूगोस्लाविया से भारत आईं और कोलकाता को केन्द्र मानकर उन्होंने अपनी गतिविधियाँ शुरू कीं। तभी से अधिक आयु होने पर भी अपनी हज़ारों स्वयं सेविकाओं के साथ अनाथ, अनाश्रित एवं पीड़ितों के उद्धार कार्य में अथक रूप से लगी हुई थीं। 

 मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं है। उन्होनें सद्भाव बढाने के लिए संसार का दौरा किया है। उनकी मान्यता है कि 'प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बडी है।' उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वय्ं-सेवक भारत आये तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना है कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें - भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें, अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें।

मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिये विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से विभूषित किय गया है। 1931 में उन्हें पोपजान तेइसवें का शांति पुरस्कार और धर्म की प्रगति के टेम्पेलटन फाउण्डेशन पुरस्कार प्रदान किय गया। विश्व भारती विध्यालय ने उन्हें देशिकोत्तम पदवी की जो कि उसकी ओर से दी जाने वाली सर्वोच्च पदवी है। अमेरिका के कैतथोलिक विश्वविध्यलय ने उन्हे डोक्टोरेट की उपाधि से विभूशित किय। भारत सरकार् द्वारा 1962 में उन्हें 'पद्म श्री' की उपाधि मिली।1988 में ब्रिटेन द्वारा 'आईर ओफ द ब्रिटिश इम्पायर' की उपाधि प्रदान की गयी। बनारस हिंदू विश्वविध्यलय ने उन्हें डी-लिट की उपाधि से विभूषित किया। 19 दिसम्बर 1979 को मदर टेरेसा को मानव-कल्याण कार्यों के हेतु नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। वह तीस्री भारतीय नागरिक है जो संसार में इस सबसे बडी पुरस्कार से सम्मानित की गयी थीं।

यह भी पढ़ें...Biography of Rani Laxmi Bai in hindi >>> झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी...


मदर टेरेसा के हेतु नोबल पुरस्कार की घोशणा ने जहां विश्व की पीडित जनता में प्रसन्नता  का संचार हुआ है, वही प्रत्येक भारतीय नागरिकों ने अपने को गौर्वान्वित अनुभव किया। स्थान स्थान पर उन्का भव्या स्वागत किया गया। नार्वेनियन नोबल पुरस्कार के अध्यक्श प्रोफेसर जान सेनेस ने कलकत्ता में मदर टेरेसा को सम्मनित करते हुए सेवा के क्शेत्र में मदर टेरेसा से प्रेरणा लेने का आग्रह सभी नागरिकों से किया। देश की प्रधान्मंत्री तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने मदर टेरेसा का भव्य स्वागत किया। अपने स्वागत में दिये भाषणों में मदर टेरेसा ने स्पष्ट कहा है कि "शब्दों से मानव-जाति की सेवा नहीं होती, उसके लिए पूरी लगन से कार्य में जुट जाने की आवश्यकता है।" उन्होंने यह भी घोषणा की है कि भविष्य में किसी प्रकार के स्वागत समारोह में सम्मिलित नहीं होंगी और निरंतर सेव कार्य में लगी रहेंगी। निस्चित रूप से मदर टेरेसा निष्काम कार्य में विश्वास करने वाली हैं। कर्मयोग का जो दर्शन गीता में परिलक्षित होता है वह मदर टेरेसा के जीवन में चरितार्थ हुआ है।

बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। वर्ष 1983 में 73 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। उस समय मदर टेरेसा रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गई थीं। इसके पश्चात वर्ष 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया। साल 1991 में मैक्सिको में न्यूमोनिया के बाद उनके ह्रदय की परेशानी और बढ़ गयी। इसके बाद उनकी सेहत लगातार गिरती रही। 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के समय तक ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में 4000 सिस्टर और 300 अन्य सहयोगी संस्थाएं काम कर रही थीं जो विश्व के 123 देशों में समाज सेवा में कार्यरत थीं। मानव सेवा और ग़रीबों की देखभाल करने वाली मदर टेरेसा को पोप जॉन पाल द्वितीय ने 19 अक्टूबर, 2003 को रोम में “धन्य” घोषित किया।
Read More